गीतिका/ग़ज़ल

“पहचान”

लौटी गीता अपने घर, है कितना सुन्दर अवसर
उठों आज लौटा आये, जिसका सम्मान उसीके घर ||

लौटाने की होड़ लगी, कोई बचपन भी लौटाएगा
लौटा दो माँ की ममता, जो टंगी हुयी है नभपर ||

मांग रही है माटी हमसे, अपनी महक पुरानी
चलों आज लौटा आयें, हरियाली उसके पथपर ||

पूछ रहे हैं गुरू हमारे किधर गया मेरा ज्ञान
उनकी पोथी उनकों अर्पण, लौटाएं हम मिलकर ||

देता सम्मान शरण उनकों, जो करते हैं सम्मान
छा जाती आँखों में करुणा, सुर्ख लवों पर आकर ||

खेल-खेल में बच्चों ने, तोड़ दिया गुलदस्ता एक
कैसी लगती हूँ बतलाओं, कहती तस्वीर बिखरकर ||

नीला पीला लाल हरा हर रंगों की पहचान अलग
सप्तरंगी वह इन्द्रधनुष,उग आया खुद अंबर पर ||

महातम मिश्र

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ