कविता

कविता

सुनो
हम बिछड़ के भी बिछड़ते कहां है??

देखो ज़रा,..
हम दोनों अकसर मौज़ूद रहते है
एक दूसरे की
यादों में,
ख्वाबों में,
धड़कनो में,..

जेहन से उठते सवालों में,
मन से निकलती दुआओं में,
अरमानों की झोली में,
बातों के सिलसिलों में,
आज के परिणामों में,
कल की योजनाओं में,..

शायद
एक दूसरे के
जीवन के
हर पहलू में,
हर छोर पर,
हर मोड़ पर,..

या यूं ही कह दूं तो,…
हम इस तरह से एक दूसरे की
ज़िंदगी में शामिल हैं
जहां हम साथ हों
वही हमारी मंज़िल है,…
है ना!!!

.प्रीति सुराना