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ईश्वर की आज्ञानुसार आचरण करना ही भक्ति है : आचार्य आशीष –

ओ३म्

वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून में ग्रीष्मोत्सव का तीसरा दिन-

वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के ग्रीष्मोत्सव के तीसरे दिन आज प्रातः 5.00 बजे 6.00 बजे तक योगाभ्यास व साधना तथा 6.30 बजे अथर्ववेद आंशिक पारायण यज्ञ हुआ। यज्ञ के समापन पर विश्वविख्यात गीतकार पंडित सत्यपाल पथिक जी का एक भजन हुआ जिसके बोल थे प्रभु तुम अणु से भी सूक्ष्म हो और गगन से भी विशाल हो, मै मिसाल दूं तुम्हें कौन सी दुनिया में तुम बेमिसाल हो।’ पथिक जी द्वारा सृजित यह गीत बहुत ही लोकप्रिय भजन है। वह जहां भी जाते है, श्रोता उनसे इस भजन को प्रस्तुत करने का अनुरोध करते हैं। इस भजन के बाद आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी का प्रवचन हुआ। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन अनमोल व बहुमूल्य है। वस्तुतः यह मनुष्य जीवन जीवात्मा की मुक्ति का द्वार है। इस मनुष्य योनि रूपी द्वार से ही जीवात्मा वा मनुष्य मुक्त हुआ करता है। मनुष्य जीवन भी जीव की अनन्त यात्रा में एक पड़ाव के समान है। इस मनुष्य जीवन में तीन सम्भावनायें खुलती है। पहली यह कि जीव मुक्त हो जायेगा। दूसरा यह कि उत्तम मनुष्य जीवन प्राप्त कर सकेगा और तीसरी यह कि वर्तमान मनुष्य जीवन से निम्न मनुष्य जीवन या मनुष्येतर नीची योनियों को प्राप्त होगा। हम सब मनुष्य अपना उत्तम भविष्य बनाना चाहते हैं।  इसके लिए हमें जीवन के अन्तिम छोर अर्थात् मुक्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिये। हम सभी बहुत सौभाग्यशाली हैं कि वैदिक परम्पराओं से जुड़कर हम ईश्वर की भक्ति कर रहे हैं। संसार के अन्य इस ईश्वर की विशेष भक्ति से अनभिश्र हैं। उन्होंने कहा कि प्रभु की आज्ञाओं का पालन करने के लिए स्वयं को प्रस्तुत रखना अर्थात् उन्हें अपने आचरण में ढालना ही भक्ति है।

आचार्य आशीष जी ने कहा कि यज्ञ में स्पष्टता से मन्त्रों का उच्चाकरण करना सबको आना चाहिये। उन्होंने कहा कि यज्ञ का अर्थ देवपूजा, संगतिकरण व दान के विषय में आप जानते ही हैं। सामान्य भाषा मे यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। इससे अच्छा व श्रेष्ठ अन्य कोई कर्म नहीं होता। इसी कारण यज्ञ को करने से हम उन्नत होते हैं। यज्ञ करने से समाज श्रेष्ठ बनता है। यज्ञ करने वाले सभी मनुष्यों की उन्नति होना सुनिश्चित है। आचार्य आशीष जी ने कहा कि अपने बच्चों को वैदिक परम्पराओं से अवगत कराते समय उन्हें यज्ञ के महत्व से भी परिचित कराना चाहिये। यज्ञ का अर्थ बहुत व्यापक है। यज्ञ के पांच प्रकार के विभाग किये गये हैं। विश्व के सभी मनुष्यों को विकसित करने के लिए यज्ञ की पांच श्रेणियां बनाई गईं हैं। इन्हें पांच महायज्ञ कहा जाता है। यह पंच-महायज्ञ देश विदेश के सभी मनुष्यों को उन्नत बनाने के लिए आवश्यक हैं। हम अपने भीतर शान्त, सन्तुलित व भयरहित हों, तभी हम समाज को ज्ञान से पूर्ण शान्ति देने वाले विषयों का उपदेश दे सकते हैं। शरीर की बाहरी व आन्तरिक शुद्धता का होना भी आवश्यक है। आन्तरिक शुद्धता के लिए यम व नियमों का पालन आवश्यक है। सन्ध्या, योगाभ्यास व ध्यान द्वारा हम आत्मा को परमात्मा से जोड़कर अपने अन्तःकरण, मन व चित्त आदि की आन्तरिक स्थिति को सुदृण बनाते हैं। इसे शास्त्रीय भाषा में हम यज्ञ कहते हैं। अपनी सन्तानों को अच्छे संस्कार देने के लिए सभी माता-पिता प्रयत्नशील है। हमें मन पर नियंत्रण करना सीखना है। सत्य व असत्य का चिन्तन करना है, हीन भावनाओं से बचना है, इसके लिए आन्तरिक क्रियायें, ध्यान व योगाभ्यास आदि हैं। इस कार्य व क्रिया करने को ब्रह्म यज्ञ कहते हैं। यज्ञ का नाम सुनते ही नये व्यक्ति के मन में अग्नि में आहुतियां डालने का दृश्य उपस्थित होता है। अग्नि में आहुति डालने वाला कार्य केवल एक प्रकार का यज्ञ है। यह सबके लिए अनिवार्य है। दूसरा देव यज्ञ वा अग्निहोत्र है। शुद्ध पर्यावरण, शुद्ध वायु व शुद्ध जल सबके लिए आवश्यक है। हमें प्रदुषण के कारणों को जानना है। प्रदुषण का प्रमुख कारण मनुष्य के नाना प्रकार के कार्य हैं। मनुष्य के शरीर से निकलने वाला प्रत्येक पदार्थ पर्यावरण को प्रदुषित करता है।

हमारा श्वांस जो बाहर आता है, उससे भी वायु प्रदुषित होती है। विद्वान वक्ता ने प्रश्न किया कि क्या हम इसे रोक सकते हैं? इस प्रदुषण को रोकने का उपाय क्या है? उन्होंने कहा कि हमें उस वैज्ञानिक प्रक्रिया का अनुष्ठान करना है जिससे वायु में स्वास्थ्यवर्धक गैसें उत्पन्न हों व वायु की हानिकारक गैसे समाप्त हों।

आचार्य आशीष जी के उपदेश के बाद स्वामी दिव्यानन्द जी ने धर्मप्रेमी जनता को कहा कि वह वायु शोधक और मनुष्य की सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने वाले यज्ञ को सारे देश में फैलायें। उन्होंने ईश्वर से कामना की कि सभी अपने अपने जीवन में सदा स्वस्थ रहें। सबके मनों में प्रसन्नता रहे। सब पुत्र-पौत्र वालें हों और धन-धान्य से सदा बढ़ते रहें। इन आर्शीवचनों को बोल कर अथर्ववेद पारायण यज्ञ के ब्रह्मा स्वामी दिव्यानन्द जी ने सभी यजमानों व धर्मप्रेमी सज्जनों को अपना आशीर्वाद व शुभकामनायें दीं। इसके पश्चात तपोवन आश्रम द्वारा संचालित तपोवन विद्या निकेतन की कक्षा नर्सरी से कक्षा 8 तक के उन सभी बच्चों को जो अपनी अपनी कक्षाओं में प्रथम, द्वितीय व तृतीय आये थे, आश्रम के यशस्वी प्रधान श्री दर्शन कुमार अग्निहोत्री की ओर से नगद पुरुस्कार देकर सम्मानित किया गया। अपने आशीर्वादात्मक उपदेश में श्री दर्शन कुमार अग्निहोत्री ने कहा कि हमें प्रसन्नता है कि हमारे विद्यालय के बच्चे जीवन में आगे बढ़ रहें हैं। प्रधान जी ने एक दिन पूर्व आश्रम द्वारा सम्पन्न युवा सम्मेलन की ओर ध्यान दिलाया जहां आश्रम के विद्यालय के बच्चों ने सबके सम्मुख बहुत अच्छा सराहनीय प्रदर्शन किया था। उन्होंने बच्चों को सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने की प्रेरणा व कामना की। शान्ति पाठ के साथ प्रातःकालीन सत्र समाप्त हुआ जिसके बाद सभी लोगों ने मिलकर प्रातराश लिया। इसके पश्चात महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। समाज सुधार में नारी का योगदान, नारी सम्मेलन का विषय था जिसमें अनेक विदुषी महिलाओं ने शास्त्रों व अपने अनुभव से अर्जित प्रेरक विचार प्रस्तुत किये। अपरान्ह 3.30 बजे से अथर्ववेद पारायण यज्ञ आरम्भ हुआ जिसके अनन्तर यज्ञ के ब्रह्मा का यजमोनों को आशीर्वाद, पं. सत्यापाल पथिक जी का भावपूर्ण भजन प्रभु तुम अणु से भी सूक्ष्म हो और गगन से भी विशाल हो।’ हुआ। इस कार्यक्रम में आगरा से पधारे आर्यसमाज के शीर्ष विद्वानों में से एक पं. उमेश चन्द्र जी स्नातक के ‘‘ईश्वर देवता विषयक व्याख्यान” से चार चांद लग गये। सभी ने उनका व्याख्यान बहुत पसन्द किया। इस उपदेश की महत्ता के कारण हम इसे अलग से प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। रात्रिकालीन सत्र में पं. सत्यपाल पथिक जी के 20 मिनट तक भजन व गीत हुए। उनके बाद कलकत्ता से पधारे डा. कैलाश कर्मठ जी के आधा घण्टा तक भजन हुए। कर्मठ जी के बाद आर्य विद्वान श्री उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का प्रवचन हुआ। सभी प्रस्तुतियां धार्मिक भाव उत्पन्न करने में पूर्ण समर्थ होने के साथ सभी लोगों के ज्ञानवर्धन में पूर्ण सहायक थी। शान्तिपाठ के साथ रात्रिकालीन सभा विसर्जित हुई।

मनमोहन कुमार आर्य

2 thoughts on “ईश्वर की आज्ञानुसार आचरण करना ही भक्ति है : आचार्य आशीष –

  • लीला तिवानी

    प्रिय मनमोहन भाई जी, पथिक जी का एक-एक भजन बेमिसाल व लाजवाब होता है. यज्ञ का अर्थ बहुत अच्छा लगा. ईश्वर की आज्ञानुसार आचरण करना ही भक्ति है, ऐसी भक्ति से ही मुक्ति मिलती है. अत्यंत सुखद व शांतिदायक आलेख के लिए आभार.

    • मनमोहन कुमार आर्य

      नमस्ते एवं हार्दिक धन्यवाद बहिन जी। पथिक जी ने लगभग एक सहस्र भजनों की रचना की है। उनका भजन संग्रह कुछ माह पूर्व दो खण्डों में प्रकाशित हुआ है। हिन्दू मतों के अनेक आचार्य उनके भजनों को गाते हैं। उनका एक प्रसिद्ध भजन है “हम सब मिलके आये दाता तेरे दरबार भर दे झोली सबकी तेरे पूरे भंडार”. सादर।

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