गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका/गज़ल

खुल जाती है नित्य नींद एक, नया सबेरा लेकर
अरमानों के विस्तर पर इक, नया बसेरा लेकर

चल देते हैं पाँव रुके बिन, अपनी अपनी मंजिल
ढ़ल जाता दिन रफ़्ता रफ़्ता, नया बसेरा लेकर।।

मिल जातें हैं कहाँ सभी को, खुशियों के दिन ठाँव
दिन में शाम तंग हो जाती, नया बसेरा लेकर।।

जाने कितने उठ जाते हैं, कितने उठा दिए जाते
कितने अम्बर लहराते नित, नया बसेरा लेकर।।

कितने फूल विखर जाते हैं, गुलदस्ते में आकर
कितने चढ़ उतराने लगते, नया बसेरा लेकर।।

हर तारो में नहीं तरंगें, होत न पूनम हर दिन
हर पल चाँद चमकता कैसे, नया बसेरा लेकर।।

गौतम जिसकी ड्योढ़ी जैसी, वैसी चढ़ती पूजा
नीति रीत परताप फले फल, नया बसेरा लेकर।।

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ

2 thoughts on “गीतिका/गज़ल

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी रचना !

    • महातम मिश्र

      सादर धन्यवाद विजय सर जी

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