लघुकथा

श्वास

मुंगेरी अपने सामने धू धूकर जलती इमारत को देख फफक कर रो पड़ा| सारे मजदूर दुखी थे पर आंसू किसी ने न बहाए| लेकिन मुंगेरी ऐसे रो रहा था जैसे उसकी अपनी कमाई जलकर ख़ाक हो रही हो |
“तू इतना काहे रो रहा रे !” एक बुजुर्ग बोला|
“मेरी मेहनतss”
” मेहनत तो सबने की थी न, तेरी तरह तो कोई न रो रहा| और कौन सी अपनी मेहनत की कमाई लगी इसमें| हम तो राजगीर है, मजदूरी मिली तो दीवार से रिश्ता ख़त्म|”
“मेरा तो सपना जल रहा| अपना तन जलाकर कितने मन से बनाया था मैंने| जो देखता वह मुझे ही याद करता|” मुंगेरी आंसू पोंछते हुए बोला|
“अरी ! ताजमहल थोड़े ही बनाया था| कहकर एक मजदूर युवक ठहाका मार के हंसा|
“मेहनत से मैंने मंदिर बनाया था| जिसमें सुकून बसाया था| दीवारें भी बोलती हुई सी थीं इसकी | रहने वाला मकान या तल्ले में नहीं बल्कि घर में रहना महसूस करता|”
“ऐसा क्या किया था रे तूने !!
आह के श्वास से नहीं बल्कि मैंने मेहनत और उल्लास से भर खड़ी करीं थीं दीवारें |

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|