गीत/नवगीत

तुम्हें लिखनी ये पाती है

अदाएं याद आती हैं
वफायें याद आती हैं
मेरे गुजरे हुए लम्हे
तुझे लिखनी ये पाती है
तुम्हारे देस की यादें
तुम्हारे भेस की बातें
फुहारों भीगते से दिन
महकती चांदनी रातें
बहुत हो दूर भी हमसे
मन से तुमको मिलाती हैं
वफ़ा तुमने नही छोड़ी
मैंने शिद्दत नही तोड़ी
यही एक आसरा अपना
न ये छोड़ी न वो तोड़ी
किसी दिन मिलने आओगे
दिल को समझा के जाती हैं
कभी यूँ ही अकेले में
जग के मेले झमेले में
बहक जाते कदम जब हैं
वक़्त के क्रूर खेले में
हवाएँ हों या तूफ़ान हो
दो बाहें थाम जाती हैं
किसी दिन लौटकर आना
कुछ एक दिन ठहर जाना
समय की ढेरियों से चुन
हाल बेहाल पढ़ जाना
कही तो रोज ही कुछ हैं
कुछ उस पल भी सुनानी है
मेरे गुजरे हुए लम्हे
तुझे लिखनी एक पाती है
बना बिगड़ा बहुत कुछ ही
यहाँ तुमसे जुदा होकर
कई दिन जागते बीते
मिलन के स्वप्न में खोकर
दिल के मंजर चले खंजर
मौन की भी ज़ुबानी है
रज़ा भी याद आती है
सज़ा भी याद आती है
मेरे गुजरे हुए लम्हे
तुम्हें लिखनी ये पाती है

प्रियंवदा

प्रियंवदा अवस्थी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साहित्य विषय में स्नातक, सामान्य गृहणी, निवास किदवई नगर कानपुर उत्तर प्रदेश ,पठन तथा लेखन में युवाकाल से ही रूचि , कई समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित , श्रृंगार रस रुचिकर विधा ,तुकांत अतुकांत काव्य, गीत ग़ज़ल लेख कहानी लिखना शौक है। जीवन दर्शन तथा प्रकृति प्रिय विषय । स्वयं का काव्य संग्रह रत्नाकर प्रकाशन बेदौली इलाहाबाद से 2014 में प्रकाशित ।