उपन्यास अंश

आजादी भाग –१०

” लेकिन भाई ! वह मोटर तो बहुत बड़ा होगा न ? फिर हम लोग उसको कैसे उठा पाएंगे ? ” सोहन ने अपनी शंका व्यक्त की थी ।
विजय ने उसकी तरफ देखा और धीरे से उसके सर पर एक चपत लगाते हुए बोला ” अरे पागल ! तूझे मुझ पर भरोसा है कि नहीं ? मैं जो भी प्लान बनाता हूँ सब सोच समझ कर और हर पहलु पर गौर करके योजना बनाता हूँ । अब तुमने पूछ ही लिया है तो बता दूँ कि तुम ये भूल गए हो कि अब हम तीन के बदले चार हो गए हैं और हमें अपना काम भी चार लोगों के अनुरूप ही खोजना होगा । हम चारों के लिए वह मोटर उठाना मुश्किल नहीं होगा । और फिर मैंने उसे ढोने का इंतजाम भी सोच लिया है । हमने वहां जाकर मोटर को खोलकर सिर्फ बाहर लाना है । राजु ऑटो वाले से मैंने बात कर ली है । वह जहां और जब मैं बुलाऊंगा आ जाएगा । किराया थोडा ज्यादा मांग रहा था तो कोई बात नहीं दे देंगे । समझे ? ”
अब सोहन उसकी बात से सहमत नजर आ रहा था ।
” तो फिर ठिक है । अब चलें ! देर किस बात की ? ”
थोड़ी देर बाद चारों बगीचे की तरफ बढ़ते हुए अँधेरे में गुम हो गए ।
शहर के बाहरी इलाके में एक बस्ती के बाहर पहुंचने में उन्हें लगभग आधे घंटे से अधिक का समय लग गया । बस्ती के बाहर ही पानी की एक छोटी सी टंकी और उसके करीब ही एक पंप रूम बना हुआ था ।

पंप रूम के दरवाजे पर लटके मोटे से ताले ने विजय को आश्वस्त कर दिया था । उनके लिए मैदान साफ़ था । दरवाजे पर लटका हुआ ताला इस बात की गवाही दे रहा था कि पंप रूम लावारिस है ।
विजय  इधर उधर देखते हुए जेब से एक तार निकाल कर दरवाजे पर लटके ताले से उलझ गया और दो मिनट के अल्प परिश्रम से ही उसे उस ताले को खोलने में कामयाबी मिल गयी । दरवाजा खोलकर वह कमरे में घुसा । अन्दर एक छोटा बल्ब पहले से ही टिमटिमा रहा था । इस बल्ब ने विजय की मुश्किल को आसान कर दिया था ।
अपनी जेब में रखे पक्कड़ से विजय ने मोटर से जुड़े वायर को काट दिया और पाना लेकर फाउंडेशन के नट खोलने लगा ।
नट खोलने में मशगुल विजय ने रईस को बुलाया और उसे बस्ती में घुसते ही तीसरे घर के सामने खड़ी साइकिल को उठा लाने के लिए कहा । विजय ने आते हुए ही एक घर के बाहर रखी साइकिल देख लिया था ।
रईस ने सोहन को साथ लिया और उस घर की ओर बढ़ गया । उनके जाते ही विजय ने राजु ऑटो वाले को दस मिनट में पंप रूम के पास आने का निर्देश दिया और अपने काम में लग गया ।
करीब दस मिनट बाद ही विजय ने सोहन ‘ रईस ‘ राहुल और राजु की मदद से वह मोटर ऑटो में रखा । रईस को साइकिल से अपने पुराने ठिकाने पर आने के लिए कहकर विजय सोहन और राहुल के संग उस बस्ती से विपरीत दिशा की ओर जानेवाले रस्ते पर आगे बढ़ा ।
एक सुनसान जगह पर बनी एक झोपड़ी के सामने जाकर ऑटो रुक गया था । झोपड़ी के बाहरी हिस्से में सो रही एक सत्तर वर्षीया वृद्धा को जगाते हुए विजय ने कहा ” माई ! ओ माई ! उठ ! देख मैं ये अपनी अमानत अभी यहाँ रख रहा हुं । बाद में मामला शांत होने पर इसके बारे में फिर सोचेंगे । तब तक इसको यहीं रहने देना । ठीक है ! अबकी उपरवाले ने चाहा तो मैं तुझको भी खुश कर दूंगा । ”
खांसते हुए उस वृद्धा ने उठकर झोपड़ी का द्वार खोल दिया था । चारों ने मिलकर उस मोटर को उठाकर झोपड़े में रख दिया । मोटर को कमरे में रखकर जैसे ही सब बाहर आये रईस उन्हें साइकिल से आता हुआ दिखा ।
साइकिल को भी झोपड़े के अंदरूनी हिस्से में रखकर विजय ने राजु को सौ का एक नोट देकर विदा कर दिया ।
उस वृद्धा से थोड़ी देर तक बात करने के बाद उसे सौ का एकं नोट दिया । वृद्धा ने नोट लेते हुए उसपर आशीर्वादों की झड़ी लगा दी थी । उसपर ध्यान न देते हुए विजय अपने साथियों के साथ शहर की तरफ चल पड़ा ।
कुछ ही दुर गए थे कि विजय ने अगले चौराहे पर लगी पुलिस की नाकेबंदी को देख लिया । साथ ही चल रहे सोहन और रईस को हाथ पकड़ कर रोकते हुए विजय ने कानाफूसी की ” देखो ! सामने ही पुलीस की नाकाबंदी है । हवलदार पहचानने वाला हो सकता है लेकिन अगर साहब पहचान का नहीं हुआ तो ? उठा कर सीधा अन्दर डाल देगा । एक काम करते हैं तुम सब यहीं छिप जाओ । छिपकर मेरे इशारे का इंतजार करना । मैं अकेले आगे जाऊंगा और सब कुछ ठीक रहा तो आगे जाते हुए अपना दोनों हाथ उठाऊंगा । तब तुम एक एक कर आगे आना और हम अगले चौराहे से पहले मिल जायेंगे । समझ गए ? ”
तीनों ने सहमति व्यक्त की ” हाँ ! ठीक है । ”
तीनों वहीँ सड़क के नीचे स्थित ख़ाली जगह में छिप गए और ध्यान से विजय को चहलकदमी करता हुआ पुलीस नाकाबंदी की तरफ बढ़ते हुए देखते रहे ।
सामने पुलीस की घेराबंदी को देखकर राहुल बुरी तरह से घबरा गया था । उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था । साँसे तेज तेज चल रही थीं और अब वह चोरी में शामिल होने के अपने फैसले पर बुरी तरह पछता रहा था । ‘ अगर कहीं वह पकड़ा गया तो ?
अखबार में उसका फोटो आ जायेगा । पुरी दुनिया में उसकी बेइज्जती हो जाएगी । अपने माँ बाप को क्या मुंह दिखायेगा ? ‘ उसे अपने सारे सपनों पर पानी फिरता नजर आ रहा था । फिर फिल्मों में देखे गए जेल के दृश्य उसकी आँखों के सामने तैर गए ।
जेल में कैसे गुंडों की दहशत रहती है । पुराने खतरनाक कैदी कैसे नए आनेवाले कैदियों से दुर्व्यवहार करते हैं । फिर मारपीट होती है । तभी उसके बाल मन में सवाल कौंधा ‘ लेकिन मैं किसी कैदी को कैसे मार पाउँगा ? अभी तो मैं बहुत छोटा हुं । ‘
अभी उसके मस्तिष्क में इसी तरह की बातें घुमड़ रही थीं कि तभी सामने पुलीस नाकेबंदी के करीब पहुँच गए विजय को एक जोरदार थप्पड़ पड़ते देख एक बारगी तो वह सीर से लेकर पाँव तक काँप उठा था ।
इधर पुलीस नाकेबंदी की तरफ लापरवाही से चहलकदमी करते पहुँच चुके विजय ने एक परिचित सिपाही को देखकर नमस्ते किया और यहीं वह गलती कर बैठा था ।
उस सिपाही ने देख लिया था कि उसका वरिष्ठ अधिकारी उसीकी तरफ देख रहा था जो अभी अभी यहाँ नया नियुक्त हुआ था । उसकी नज़रों में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लीए उस सिपाही ने विजय से उसका नाम पूछा जबकि वह उसका नाम भली भाँति जानता था । विजय ने मुस्कराते हुए उसे अपना नाम बताते हुए उससे पूछ लिया था ” मुझे नहीं पहचानते क्या साहब ?”
इतना सुनना ही था कि उस सिपाही का झन्नाटेदार थप्पड़ विजय के गाल पर पड़ा ” तुझसे जितना पूछा जाए उतना ही बता । ज्यादा होशियार मत बन । समझा ? “

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।