लेखसामाजिक

स्वतन्त्रता

स्वतंत्रता ! पढ़कर सबसे पहले अपने देश की स्वतंत्रता ज़हन में आई ।
जो भी कुछ व्यक्त कर रहीं हूँ , ये मेरा निजी मत है कृपया अन्यथा न लीजियेगा ।
स्वतंत्रता को मैं अलग अलग दृष्टिकोण से देखती हूँ
1 व्यक्तिगत
2 पारिवारिक
3 सामाजिक
4 देश
5 सर्व व्यापी
हम मानव सामाजिक प्राणी है । एक एक व्यक्ति समाज का अभिज्ञन अंग है ।
मुझे लगता है स्वतंत्रता की परिभाषा हर व्यक्ति के लिये अलग होगी । जो एक व्यक्ति के लिये सही होगा हो सकता है दूसरे के लिये वो गलत हो ।
जब हम अपनी या समाज की बात करते है तो कहीं न कहीं अपनी इच्छाओं का गला घोटना पड़ता है । हर घर में कुछ न कुछ तो होता ही हैं जिससे हमें कहीं न कहीं दुःख होता है ।
हम अपने को दो वर्गों में बाँटते है औरत और मर्द । औरतों की अपनी बातें होतीं है मर्दों की अपनी ।
स्वतंत्रता आखिर है क्या ? क्या यह अपने निजी विचार को व्यक्त करना होता है ?
हर समाज की हर देश की अपनी अपनी सोच है । हाँ कुछ सर्वव्यापी सोच है जो हमें मान्य होती हैं । कहीं न कहीं हम अपने देश के सम्विधान तहत बंधे हुए होते है और यह हमारा दायित्व भी होगा समाज और देश के बनाये नियमों का पालन करें ।
आज समय बदल रहा है । और निरंतर बदल रहा है । सोच परिवर्तित हो रही हैं । शादी को कहीं पवित्र बन्धन माना जाता था आज इस रिश्ते का प्रारूप भी बदल रहा है । कहीं कोई कॉन्ट्रैक्ट मैरिज कर रहा है , कोई लिविंग रिलेशनशिप में रहना पसन्द कर रहा है । इसको हम गलत कहते है क्योंकि हम ऐसे रिश्तों को पूर्णरूप से स्वीकार नहीं कर पा रहे । पर क्या यह रिश्ते अभी आये हैं ? क्या इतिहास ऐसे किस्सों से भरा हुआ नहीं है ?
पति पत्नी का रिश्ता विश्वास की बुनियाद पर टिका होता है। कहीं पति अपनी पत्नी से परेशान है कहीं पत्नी अपने पति से ।
क्या माने हम की हम आखिर क्या चाहते है । पड़तंत्रता हमे रास नहीं आ रही कोई खुश नही है आज , ये अलग बात है कोई इस बात को स्वीकार करे या न करें , और स्वतन्त्र हो कर कोई जीये यह भी गंवारा नहीं । फिर आखिर हम क्या चाहते हैं ?
मुझे लगता है कोई भी रिश्ता हो उसको गर सच्चे मन से स्वीकारा गया हो तो सच में सबको ख़ुशी मिलनी चाहिए ।पर क्या ऐसा होता है । हम कहते है कि हम फलां फलां रिश्ते में बंधे हुए है , जब बंधे हुए मेहसूस करते है तो फिर स्वतंत्रता ?
लिविंग रिलेशनशिप को ही गर ले ले या किसी अनैतिक सम्बन्ध् को लें तो ये सच है कि कहीं न कहीं हमारे मन को चुभता है । मन ऐसे रिश्तों को स्वीकार नहीं करता । पर गर इसमें किसीको ख़ुशी मिलती है तो बुरा क्या है ?
हम अपने ही घरों में अपने ही लोगों के बिच खुद को जब असहज मेहसूस करते है तो हम उस कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं , और यही बात गलत हो जाती है ।
ये कदम चाहे मर्द उठाये या औरत गलत करार दिया जाता है । ये बात अलग है औरत ज्यादा बदनाम हो जाती है ।
पर ऐसा क्यों ?
यह बात भी सच है की स्वतन्त्रता पतंग की तरह होती है । इसको डोर की जरुरत पड़ती है । कहीं न कहीं लगाम भी जरुरी है वरना सब तहस नहस हो जायेगा । कुदरत के अपने नियम है । सब बेलेंस होता आ रहा था , पर हम मनुष्यों को यह रास न आया । हमने अपने अधिकारों और इच्छा को लिये कुदरत के नियमों का उलंघन किया तो आज हम भुगत भी रहें है ।प्रदूषण , भुखमरी , बाढ़ , सूखा और इनके जैसी और कुदरती व्याधियों को झेल रहें है । हमने अपनी स्वतंत्रता का उपयोग किया भरपूर किया और करते चले जा रहें है । नतीजा हम सब के सामने है ।
स्वतन्त्रता पर हम सबको चिंतन करना चाहिए । हां सच और झूठ , अच्छे और बुरे को समझते हुए भी जब हम कोई गलत काम करते है तो उसको स्वीकार क्यों नहीं कर पाते ?
स्वतन्त्रता तो तब सच्ची होगी न जब हम कोई भी चीज़ को स्वीकार करें । वरना तो ये भी थोपी हुई सी प्रतीत होगी ।

कल्पना भट्ट

कल्पना भट्ट श्री द्वारकाधीश मन्दिर चौक बाज़ार भोपाल 462001 मो न. 9424473377