गीतिका/ग़ज़ल

आग का दरिया सुने ज़माना हो गया

उजड़ी नींदों का सफर भी तब सुहाना हो गया
यूँ गुज़रा छूकर वो दिल तो बस दीवाना हो गया

करवटों पे लिख रहा था जब दर्द कुछ इबारतें
सिलवटों से मन की खेल वो परवाना हो गया ।।

ख्वाब थे खामोश जागे सोये मचल कर हँस पड़े
एक अदद इनकार सौ बातों का बहाना हो गया

इश्क का अंधड़ छिपे कब साँस हो या फिर हवा
नज़रें मिली औ इश्क छलकता पैमाना हो गया ।।

मुफ़्त की बदनामियाँ ले है नाचता तब भी ये दिल
आग का दरिया सुनते मुद्दत ए ज़माना हो गया ।।
प्रियंवदा अवस्थी

प्रियंवदा अवस्थी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साहित्य विषय में स्नातक, सामान्य गृहणी, निवास किदवई नगर कानपुर उत्तर प्रदेश ,पठन तथा लेखन में युवाकाल से ही रूचि , कई समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित , श्रृंगार रस रुचिकर विधा ,तुकांत अतुकांत काव्य, गीत ग़ज़ल लेख कहानी लिखना शौक है। जीवन दर्शन तथा प्रकृति प्रिय विषय । स्वयं का काव्य संग्रह रत्नाकर प्रकाशन बेदौली इलाहाबाद से 2014 में प्रकाशित ।