कविता

एक अजनबी बनकर ही तो तुम मिले थे

एक अजनबी बनकर ही तो 
तुम मिले थे
परिचय से शुरू हुई थी बाते 
धीरे -धीरे होने लगे ढेरो बाते
और लगने लगा अपनो सा
बनाने लगे मेरे दिलो मे अपनी जगह
मै भी तुम्हे अपना ली
खुद से ज्यादा मान ली
पनपने लगा प्यार हमदोनो के बीच
रहते व्याकुल मिलने को एक दिन 
देखने को जी चाहता हर रोज 
मगर दूरी बरकरार रखा था एक ओर
समाज का लोक लाज कहो 
या माँ पापा का सम्मान 
इस कारण ही नही कर पाते
साथ बैठ कर कुछ बात
कही कोई कुछ गलत न कहे
हमे यूं ही बदनाम न कर बैठे
यही सब सोचकर हमदोनो
हो जाते निराश
क्योंकि दोस्ती मे भी कुछ लोग 
हो गये है बदनाम 
इसलिए दोस्ती बरकरार रखने के लिए 
करते रहे तुमसे दूर रह कर ही बात।
निवेदिता चतुर्वेदी ‘निव्या ‘

निवेदिता चतुर्वेदी

बी.एसी. शौक ---- लेखन पता --चेनारी ,सासाराम ,रोहतास ,बिहार , ८२११०४