धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

अपने शरीर की रक्षा के लिए मनुष्य को हर समय सावधान रहना चाहिये

ओ३म्

हमारा यह शरीर हमें परमात्मा से मिला है। यह शरीर हमारी आत्मा का साधन है। यह ऐसा साधन है जिसके द्वारा हम अर्थात् हमारी आत्मा बोल सकती है, सुन सकती है, देख सकती है और स्पर्श आदि भी कर सकती है। यह शरीर हमें कर्म करने के लिए परमात्मा ने दिया है। कर्म दो प्रकार के होते हैं सद्कर्म और असद्कर्म। परमात्मा सच्चिदानन्दस्वरूप है। परमात्मा के सत्य में स्थित होने के कारण हमें भी सत्य में स्थित व स्थिर रहना है। सद्कर्म हमें सत्य में स्थिर करते हैं। असत्यकर्म करने पर हमारी आत्मा का हनन होता है। हम जानते हैं कि जब हम बुरे विचार मन में लाते हैं तो हमारे मन में भय, शंका और लज्जा उत्पन्न होती है। इसका अर्थ यह है कि परमात्मा हमें बुरे काम करने से रोकता है। इसके विपरीत जब हम अच्छे विचार मन में लाते हैं तो हमारे मन में उस को कार्यरूप देने में उत्साह उत्पन्न होने सहित आनन्द की अनुभूति भी होती है। जो व्यक्ति परमात्मा द्वारा दिये जाने वाले इन सन्देशों को ग्रहण कर सत्य का पालन करते हैं वह जीवन में आत्मिक दृष्टि से ऊंचे उठते हैं। उनकी आत्मा का बल बढ़ता है। शरीर प्रायः निरोग व दीर्घ जीवी होता है और इसके विपरीत असत्याचरण करने वाले मनुष्यों का जीवन दुःखों से युक्त होने के साथ रोगी व अल्पायु होता है। ऐसा अनेक व्यक्तियों का अनुभव है। हम आजकल देख रहे हैं कि कुछ घोटालेबाज नेता जांच व मुकदमों में फंसे हुए हैं। कुछ धार्मिक गुरु व आचार्य भी आजकल जेल के भीतर हैं जो बाहर आने के लिए तड़फ रहे हैं।

इस संक्षिप्त लेख में हम यह कहना चाहते हैं कि हमारा यह शरीर ईश्वर की प्राप्ति का साधन है। ईश्वर की प्राप्ति होने पर हमारे समस्त दुःख वा क्लेश दूर हो जाते हैं। मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है। मृत्यु होने पर उसका पुनर्जन्म नहीं होता और उसे दीर्घावधि के लिए मोक्ष की प्राप्ति होती है। इन बातों को विस्तार से सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़कर जाना जा सकता है। अतः सद्कर्म करने के लिए हमारे शरीर का स्वस्थ वा निरोग रहना आवश्यक सिद्ध होता है। इसके साथ ही यह जितना बलवान होगा उतने ही अधिक अच्छे कार्य यह कर सकता है। बल की वृद्धि के लिए मनुष्य को अच्छा शाकाहारी सुपाच्य भोजन करने के साथ फल व गोघृत आदि का सेवन भी करना चाहिये। भोजन में मांसाहार व मदिरा आदि मादक द्रव्यों का त्याग करना चाहिये। व्यायाम व योगासन करने से भी शरीर स्वस्थ रहता व बलवान बनता है। इनका सेवन व अभ्यास भी सभी मनुष्यों को नित्य प्रति करना चाहिये। ईश्वर व उसके गुणों का ध्यान करने से भी मनुष्य के दुःख, दुर्गुण व दुर्व्यसन दूर होते हैं। अतः वेद एवं वैदिक साहित्य का स्वाध्याय करने के साथ ईश्वरोपासना पर विशेष ध्यान देना चाहिये। ईश्वरोपासना के लिए ऋषि दयानन्द सरस्वती लिखित सन्ध्योपासना ग्रन्थ का सर्वोपरि स्थान है और स्वाध्याय के लिए सबसे उत्तम ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश है। यदि इस ग्रन्थ का अध्ययन वा स्वाध्याय किया जाये तो इससे अध्यात्म व सांसारिक जीवन की भी समस्त शंकाओं व समाधान हो जाता है और मनुष्य विद्वान बनने के साथ सुख व चिन्ताओं से मुक्त स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है।

मनुष्य का शरीर ही उसके सुख व दुःख भोग का कारण व आधार है। यदि हम स्वस्थ व निरोग हैं तो सुखी हैं और यदि शरीर में रोग व किसी अंग में किसी कारण कोई स्थाई व अस्थाई रूप से विकार आ जाता है तो उससे मनुष्य को दुःख प्राप्त होता है। अतः मनुष्य को रोगों से बचना चाहिये और इसके लिए भोजन, व्याययाम व ईश्वरोपासना आदि पर ध्यान देना चाहिये। इसमें आलस्य व प्रमाद नहीं करना चाहिये। इसके अतिरिक्त कई बार छोटी छोटी असावधानियों से हम छोटी व बड़ी दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। इनसे बचने के लिए हमें जीवन के हर पल व क्षण सावधान रहने की आवश्यकता है। हम भूमि पर पैर रखे तो सोच समझ कर रखे। यदि पैर गलत पड़ जाये तो पैर में मोच आ सकती है। गाड़ी चलाते समय यदि हम संयम खो कर तेज गाड़ी चलाते हैं व आगे चल रही गाड़ियों से अपनी गाड़ी को आगे निकालते हैं तो अत्यन्त सावधानी से ऐसा करना उचित होता है। यहां भी दुर्घटना की सम्भावना होती है। दुर्घटना न हो, अतः धैर्य को धारण कर सावधानी से ही जीवन के छोटे बड़े सभी कार्यों को करना चाहिये जिससे कि जीवन में हमें कभी पछताना न पड़े। देश में प्रतिदिन सहस्रों मार्ग दुर्घटनायें होती हैं। यह सब भी असावधानी व वाहन की तेज गति के कारण होती हैं। इनसे बचा जा सकता है। हमें जीवन में नियमों का पालन करना चाहिये। हम सुनते हैं कि यूरोप के देश में लोग हमसे अधिक अनुशासनप्रिय हैं। क्या हम उनसे उनकी अच्छी बातों को ग्रहण नहीं कर सकते। शिक्षा तो छोटे व बड़े, अपने व पराये यहां तक की शत्रु से भी ली जा सकती है। महर्षि दयानन्द जी ने आर्यसमाज का चौथा व पांचवा नियम ही यह बनाया है कि मनुष्यों को सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहियें। यदि हम इन नियमों का जीवन के हर क्षेत्र में सावधानी से पालन करेंगे तो हम छोटी व बड़ी अनेक प्रकार की दुर्घटनाओं से बच सकते हैं। ऐसा होने पर हम स्वस्थ, सुखी, निरोग व दीर्घजीवी हो सकते हैं। अतः सभी मनुष्यों को अपने शरीर व स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिये और इस शरीर को ईश्वर प्राप्ति की साधना में लगाकर इसी जन्म में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने चाहिये।

हमने शरीर की महत्ता व उपयोगिता के कारण इसकी रक्षा की ओर ध्यान दिलाने का प्रयत्न किया है। जो बन्धु इसका पालन करेंगे वह जीवन मे अनेक दुर्घटनाओं से बच सकते हैं। ओ३म् शम!।

मनमोहन कुमार आर्य

 

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