लघुकथा

जिन्न

वह बहुत चिंतित हो गई थी जब जानकार ने कहा था कि तुम्हारे बेटे पर तो जिन्न का साया है और ये जिन्न इसे छोड़ेगा नहीं,लेकर ही जाएगा।बहुत अतृप्त आत्मा है।इतनी आसानी से इससे पीछा छुड़ा भी नहीं पाएंगे। झाड़-फूंक के लिए दारू-मुर्गा और पूजा की सामग्री की व्यवस्था करना पड़ेगी।पूछा भी कि इस पर जिन्न कब से सवार हुआ और उत्तर भी दिया कि जो दिखाई दे रहा है उसके हिसाब से तो इस पर जिन्न रात में नौकरी से लौटते समय गलत जगह पैर रखने से किसी समय सवार हुआ होगा,तब से ही इसको रोज दारू और मटन की तलब लगी होगी।वह जानकार की बात से प्रभावित हुई थी क्योंकि तीन साल पहले तक तो केलासिया कितना अच्छा था।बिल्कुल हुनरमंद लड़का था।हर कोई उसके काम की तारीफ करता था जब से फेक्ट्री की नौकरी शुरु की और कुछ लोगों की संगत मिली,शायद तब से ! लेकिन हाँ, अचानक पता नहीं क्या हुआ कि पहले तो बाहर से दारू पीकर आने लगा और बाद में जब उसे रोकना चालू किया तो बीवी-बच्चों से ही मारपीट करने लगा।फैक्ट्री से मिलने वाला पैसा तो उड़ा ही देता है,घर का सामान बेचना भी चालू कर दिया और घरवालों से रोजाना रूपये मांगना अलग शुरु कर दिया ।नाराज बड़ा लड़का गोविंद घरवाली के साथ अलग रहने चला गया। एक बार जब केलासिया दारू के नशे में घर पर ही मटन बनाने की जिद पर अड़ गया तो केलासिया के बापू ने रोकने की कोशिश की थी तब केलासिया उनके पीछे कुल्हाड़ी लेकर दौड़ा था।तभी से शक हो गया था कि कुछ गड़बड़ है।इसीलिए जब जानकार ने बाहरी बाधा बताई और उतारे के लिए दारू-मुर्गा मांगा तो तत्काल दे दिया था।आखिर छोरे की जिंदगी का सवाल था लेकिन जानकार भी कमजोर ही निकला ,वो भी जिन्न से छुटकारा नहीं दिलवा पाया ,सीधे-सीधे समझ में आ गया कि जिन्न भारी है।आज जब फिर केलासिया ने घर सिर पर उठा लिया और दारू-मटन के लिए पैसों की मांग की तो स्पष्ट हो गया कि जिन्न अभी भी पीछे लगा हुआ है,उसने बहुत हंगामा किया तो तत्काल ही रूपये दे दिये थे।अब जब दारू-मटन उसके हलक से नीचे उतर चुके हैं तो खटिया पर कैसा पड़ा हुआ है।
इधर केलासिया अपने भीतर के जिन्न की इच्छापूर्ति के बाद निढाल सा पड़ा हुआ था और उसके भीतर का जिन्न माँ के भोलेपन पर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था और उधर केलासिया की बीवी सोच रही थी कि अच्छा होता सासू माँ झाड़-फूंक करने वाले ओघड़ को दारू-मुर्गा देने के बजाय इस जिन्न को ही देने के लिए रख लेती तो कम से कम एक दिन और जिन्न के कोप से बचे रहते।

*डॉ. प्रदीप उपाध्याय

जन्म दिनांक-21:07:1957 जन्म स्थान-झाबुआ,म.प्र. संप्रति-म.प्र.वित्त सेवा में अतिरिक्त संचालक तथा उपसचिव,वित्त विभाग,म.प्र.शासन में रहकर विगत वर्ष स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ग्रहण की। वर्ष 1975 से सतत रूप से विविध विधाओं में लेखन। वर्तमान में मुख्य रुप से व्यंग्य विधा तथा सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर लेखन कार्य। देश के प्रमुख समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सतत रूप से प्रकाशन। वर्ष 2009 में एक व्यंग्य संकलन ”मौसमी भावनाऐं” प्रकाशित तथा दूसरा प्रकाशनाधीन।वर्ष 2011-2012 में कला मन्दिर, भोपाल द्वारा गद्य लेखन के क्षेत्र में पवैया सम्मान से सम्मानित। पता- 16, अम्बिका भवन, बाबुजी की कोठी, उपाध्याय नगर, मेंढ़की रोड़, देवास,म.प्र. मो 9425030009