सामाजिक

21 दिनों का लॉकडाऊन

21 दिनों का लॉकडाऊन क्या हुआ कि घर,  परिवार ,फोन,  टीवी,सोशल मीडिया हर जगह पर बस यही चर्चा चलने लगी कि इतने दिन घर पर रहकर क्या किया जाए…?
ऊबे हुए दिन इतने लंबे कभी ना थे ,वक्त इतना ठहरा हुआ कभी ना था , जिंदगी इतनी बंधी कभी नही बीती । हमेशा कोफ्त होती थी कि अपने लिए समय नही मिलता है मुझे । हर वक्त जिम्मेदारियों को निभाते हुए ऐसी व्यस्तता कि कितनी ही किताबे खरीद कर पड़ी थी लेकिन उन्हें पढ़ने का समय नही मिल पा रहा था । इस वजह से झुंझलाहट होती थी ।
अब जब अवकाश मिला भी तो अटूट बेड़ियों के साथ… ।   अब तो  प्रतिबंध के साथ-साथ लोगों को एक अनजाना भय घेर रहा है । लॉकडाउन अवधि लम्बा खींचने पर समाज के मनोविज्ञान पर गहरा असर पड़ेगा । भविष्य में अवसाद के मरीजो की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी ऐसा डॉक्टरों का मानना है… ।
टीवी पर देखा सब अपने अपने तरीके से लाकडाऊन का बेहतर उपयोग बता रहे थे।
कोई बड़ी अभिनेत्री कामवाली के न आने की वजह से खुद का बर्तन धोने वाला वीडियो पोस्ट कर रही थी,  तो कहीं किसी गांव में भूख की मार झेलते लोग घास खाने को मजबूर थे,कोई ट्विटर पर अंताक्षरी खेल कर समय बिताने को मजबूर था , तो कोई महामारी के चलते समय से पहले ही संसार से विदा लेने की तैयारी में था…!
कई फिल्मी हस्तियां जहां ट्रेड मिल पर फालतू कैलोरी बर्न करने का वीडियो पोस्ट करते नज़र आ रहे थे, तो  वहीं दूसरी ओर न जाने कितने ही दिहाड़ी मज़दूर कई हज़ार किलोमीटर पैदल चल कर अपने घर पहुंचने की धुन में भूख प्यास भूलकर बस चलते जा रहे थे। आखिर 21 दिन का लाकडाऊन जो काटना है…।
“हमारे पास खालीपन है , बोरियत है ,मजदूरों के पास भूख है , गरीबी है ,घर की याद है… ईश्वर सबकी रक्षा करे।”
इधर रेस्टोरेंट बंद हो गए हैं और हमारे घरों के बच्चे थाली में दाल चावल देखकर मुंह बिदका कर खा रहे हैं और हम सोच रहे हैं कि अभी तो ये भी मिल रहा है आगे किसे मालूम कि हाथ में रुपए लेकर खड़े भी रहें तो क्या पता अन्न मिल भी पाएगा या नहीं…?
सबकी अपनी सोच अपना नज़रिया…।
जीवन रूपी इस ट्रेड मिल पर हर कोई बेतहाशा दौड़ रहा है…कोई रोटी पचाने के लिए और कोई रोटी कमाने के लिए…।
 हमारे त्यौहार , उत्सव, भ्रमण , मनोरंजन असल में जीवन की नीरसता को दूर करने का उपचार है । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी और मेलजोल का लती है  । बच्चे खेलने नही जा पा रहे है जिसकी खीझ उनके व्यवहार में दिख रही है । लॉक डाउन में खुद को सकारात्मक बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है ।  इतना याद रखिये कि केवल टीवी और मोबाइल से आपका दिन तो कट जाएगा लेकिन मन को वो सुकून नही मिलेगा जो जीवन शक्ति को “ऊर्जावान”  बनाए रखे… ।
हमारे आगे सिर्फ शारीरिक तौर पर सुरक्षित रहने का संकट नही है बल्कि मानसिक तौर पर भी स्वस्थ रहने की बड़ी चुनौती है इसलिए खुद को किसी शौक में व्यस्त रखे । अपने सबसे पसंदीदा काम में समय लगाए।
आप अपने दोस्तों , माता पिता , रिश्तेदारों को वीडियो कॉल करिये । इस आभाषी मुलाकात से भी आत्मीय सुख मिलेगा । मानती हूँ इस  “निषेध”  में अनमयस्कता है , बेचैनी है ,अपना वक्त जिस भी सृजनात्मक काम में लगाया आपने उसकी तस्वीरें साझा करिये ।  “प्रतिबंध”  पर फोकस ना करके खुद के पुराने शौक से मुलाकात करिये , घर में रहिए , सुरक्षित रहिए… ।
ये मुश्किल घड़ी भी कट ही जाएगी
          दूरियों की लक्ष्मण रेखा भी मिट जाएगी
       रिश्तें पुकारेंगे बाहें खोल फिर एक बार
       सुस्त वक्त को रफ्तार मिल ही जाएगी “
— रीमा मिश्रा “नव्या”