कविता

अक्षर ज्ञान

लेकर चल कोयल मुझे भी तू गाँव के द्ववारे,
छोड़ आई जहाँ बचपन के गुड्डी गुड़िया सारे!
वह सेमल का पेड़ और जमीं से उपजा पानी,
चैत्र माह मिलने आती उजले रंगत वाली नानी!
खेतों की मेंड़ो पर मैं चलती रहती थी तीरे-तीरे,
वहीं बूढ़ी सी गौ माता चरती रहती थी धीरे धीरे!
ऐसे-ऐसे दिन भी देखे जीवन की परवाह नहीं है,
अनगिन पीड़ा दबी हृदयतल में पर आह नही है!
पता नहीं था अक्षर ज्ञान इतना बेबस कर देगा,
ऊंची उड़ान की लालसा,बंद पिजरे में भर देगा!
सबको सब वहीं जो मिलता होता न अलगाव,
यूँ कोई दौड़ा शहर ना आता सबको भाता गाँव!
— मीना सामंत

मीना सामंत

कवयित्री पुष्प विहार,एमबी रोड (न्यू दिल्ली)