धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वेदों व वेदानुकूल शिक्षाओं के पालन से जीवन की उन्नति

ओ३म्

मनुष्य जो भी कर्म करता है उससे उसे लाभ हानि दोनों में से एक अवश्य होता है। लाभ उन कर्मों से होता है जो उसके वास्तविक कर्तव्य होते हैं। मनुष्य का प्रथम कर्तव्य अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना है। इसके लिये समय पर सोना जागना, प्रातः ब्राह्म मुहुर्त में 4.00 बजे जागना, ईश्वर तथा अपने कर्तव्यों का चिन्तन करना, शौच स्नान सहित भ्रमण एवं व्यायाम करने सहित समय पर उचित मात्रा में पौष्टिक एवं सात्विक भोजन करना कर्तव्य होते हैं। इन कर्तव्य-कर्मों का पालन करने से लाभ होता है जीवन उन्नति को प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य को अपनी आत्मा को ज्ञानवान बनाना तथा ईश्वर के उपकारों को स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता के भाव रखते हुए उसकी उपासना करना कर्तव्य होता है। ईश्वर से इतर अन्य सभी मनुष्यों, इतर प्राणियों व जड़़ देवताओं से भी हमें उपकार पहुंचता हैं। उनके प्रति भी हमारे मन में कृतज्ञता के भाव होने चाहियें और चेतन प्राणियों को सुख पहुंचाने की भावना होनी चाहिये। ईश्वर के सभी मनुष्यों व प्राणियों पर अगणित उपकार हैं। उन उपकारों के बदले हम अपनी ओर से उसे कुछ दे नहीं सकते। हमारे पास अपना कुछ है भी नहीं। ईश्वर को किसी वस्तु की आवश्यकता भी नहीं है। हम ईश्वर के विषय में सद्ग्रन्थों का अध्ययन करके अपना ज्ञान बढ़ाकर उसकी उचित रीति से यदि उपासना करते हैं तो हम उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञ होकर उसका गुणानुवाद करने से कृतघ्नता के पाप से बच जाते हैं। आज की शिक्षा दीक्षा ने मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाने के स्थान पर उससे दूर किया है।

आज का शिक्षित मनुष्य तो ईश्वर के सत्यस्वरूप का ज्ञान रखता है और ही उसे ईश्वर के उपकारों का ही ज्ञान है। आज के मनुष्य को ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का ज्ञान भी नहीं है। इस विषय का ज्ञान मत-मतान्तरों की शिक्षा से भी भली प्रकार से नहीं होता। कारण यह है कि मत-मतान्तरों के ग्रन्थों की रचना मध्यकाल में हुई जब देश विश्व अज्ञान के तिमिर से आच्छादित था। उन दिनों वेदों का ज्ञान लुप्त प्रायः था। अतः मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में ईश्वर सहित सृष्टि विषयक सत्य ज्ञान रहस्यों का ठीक-ठीक ज्ञान उपलब्ध नहीं होता। ईश्वर की आर्यावर्त भारत के देशवासियों पर कृपा हुई कि उसने ऋषि दयानन्द के माध्यम से वेदों का वा वेदों के सत्य वेदार्थ का पुनरुद्धार किया। ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने देश भर में घूम कर वेदज्ञान का प्रचार किया। लोगों के परामर्श से उन्होंने वैदिक शिक्षा पर आधारित ‘सत्यार्थप्रकाश’ ग्रन्थ की रचना की जिससे वेदों का सत्यस्वरूप प्रकाशित हुआ। वेदों में ईश्वर व जीवात्मा सहित प्रकृति का जो स्वरूप है, उसका भी यथार्थ बोध होता है। मनुष्य के कर्तव्य व अकर्तव्यों का ज्ञान होने के साथ ईश्वर की उपासना का प्रयोजन, उससे होने वाले लाभ तथा वायु व जल की शुद्धि के लिये किये जाने वाले अग्निहोत्र यज्ञ का भी ज्ञान वेदों के अध्ययन से होता है। यज्ञ करना धर्म क्यों है? यज्ञ न करने से मनुष्य को पाप क्यों लगता है आदि अनेक प्रश्नों का वैज्ञानिक तर्क की रीति से समाधान भी सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में किया गया है। अतः स्कूली शिक्षा से कहीं अधिक निजी हितों का लाभ मनुष्य को सत्यार्थप्रकाश सहित अन्य ऋषियों के उपनिषद, दर्शन, प्रक्षेप रहित मनुस्मृति, रामायण, महाभारत तथा वेद के अध्ययन से प्राप्त होता है।

मनुष्य को मनुष्य जीवन अपने पूर्वजन्म के श्रेष्ठ पुण्य कर्मों के कारण मिला है। यदि हम पूर्वजन्म में पुण्य कर्म पाप कर्मों से अधिक मात्रा में करते तो हमें मनुष्य योनि में जन्म मिलकर किसी पशु या पक्षि योनि में मिलता जहां तो ज्ञान होता है और ही सुख। इन योनियों में जीवात्मा अपने पाप कर्मों के दुःखरूपी फलों को भोगता है। यह ज्ञान भी वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों से होता है। सत्यार्थप्रकाश हमें यह भी बताता है कि संसार में परमात्मा किसी मनुष्य के पापों को किसी भी अवस्था में क्षमा नहीं करता। किसी मत, पंथ व सम्प्रदाय के आचार्य में यह शक्ति नहीं है कि वह परमात्मा से सिफारिश कर अपने किसी अनुयायी के पापों को क्षमा करा सके। जो ऐसा कहते हैं वह अपने व दूसरे मत के अनुयायियों से छल करते हैं। इसमें उनका स्वार्थ होता है ईश्वर पाप क्षमा करता है, यह बुद्धि, युक्ति एवं तर्क से सिद्ध नहीं होता। सत्यार्थप्रकाश ऐसा ग्रन्थ है कि जो इसके पाठक को मत-मतान्तरों की अविद्या तथा उनके छल-कपट, लोभ बल वा भय आदि के व्यवहार से भी सावधान करता है। मनुष्य सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर श्रेष्ठ व उत्तम वेद धर्म के सिद्धान्तों का चयन कर सकता है और उसका पालन कर अपनी अविद्या को दूर कर दुःखों से सर्वथा निवृत्त होकर मुक्ति को प्राप्त हो सकता है। यही कारण है कि सृष्टि के आरम्भ से ही हमारे विद्वान ऋषि-मुनि, योगी तथा साधु-संन्यासी सभी सत्य व ज्ञान के मार्ग पर चलते थे जिसकी प्रेरणा वेदों में परमात्मा ने की है। आज भी वेद का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। ईश्वर से प्रेरित एवं सभी प्रकार की अविद्या व अज्ञान से मुक्त होने के कारण वेद ही आज भी सर्वोत्तम धर्म ग्रन्थ है। मनुष्यकृत कोई भी ग्रन्थ व रचना ईश्वरीय ज्ञान वेद तथा मनुष्य द्वारा बनाये पदार्थ ईश्वर के बनाये पदार्थों से उत्तम कदापि नहीं हो सकते।

वैदिक धर्म के पालन से मनुष्य की चहुंमुखी वा सर्वांगीण उन्नति होती है। ऋषि दयानन्द ने कहा कि मनुष्य मनुष्य समाज का कर्तव्य है कि वह संसार का उपकार करे। उन्नति को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि उनके बनाये आर्यसमाज को सभी मनुष्यों की शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करनी चाहिये। यह तीनों उन्नतियां वेदों का सतर्कतापूर्वक अध्ययन तथा वेदानुरूप जीवन व्यतीत करने पर ही होती है। जब हम वैदिक महापुरुषों राम, कृष्ण, ऋषि दयानन्द एवं अन्य सच्चे महापुरुषों के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि इन महापुरुषों ने अपने जीवन वैदिक शिक्षाओं के आधार पर उन्नत किये थे तथा दूसरों की उन्नति में भी सहयोग किया था। आत्मिक उन्नति का सम्बन्ध ईश्वर व आत्मा विषयक ज्ञान तथा उसके अनुरूप आचरण से है। यह तभी सम्भव होता है कि जब हमें ईश्वर व आत्मा के विषय में ठीक-ठीक यथार्थ ज्ञान हो। सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद, दर्शन सहित वेद इस आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। ईश्वर व आत्मा का ज्ञान हो जाने तथा नियमपूर्वक ईश्वर भक्ति व उपासना से ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति होती है। आत्मिक उन्नति के बाद जिस सामाजिक उन्नति की बात की जाती है वह शारीरिक तथा आत्मिक उन्नति होने के बाद ही वैदिक ज्ञान के आचरण से सम्भव होती है। यदि शारीरिक तथा आत्मिक उन्नति नहीं होगी तो मनुष्य की सामाजिक उन्नति नहीं हो सकती। अतः वेद व सत्यार्थप्रकाश में निहित ज्ञान मनुष्य के जीवन की सर्वांगीण उन्नति की गारण्टी है, ऐसा विश्वास होता है।

मनुष्य का आत्मा अनादि, नित्य, अल्पज्ञ एवं जन्म-मरण धर्मा सत्ता है। जन्म मरण का आधार कर्म होते हैं। कर्म के भी पाप पुण्य तो मुख्य विभाग होते हैं। पाप कर्मों का फल दुःख तथा पुण्य कर्मों का फल सुख होता है। हमारा यह जन्म पूर्वजन्म के पाप पुण्य कर्मों के आधार पर हुआ है। हमारा भावी जन्म पुनर्जन्म इस जन्म के संचित कर्मों पूर्व के बचे हुए कर्मों के आधार पर होगा। अतः इस विषय पर गम्भीरता से विचार कर हमें अपने जीवन में पाप कर्मों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये और पुण्य कर्मों का संचय जिसमें ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र यज्ञ, माता-पिता-आचार्यों तथा वृद्धों की सेवा-सत्कार सहित परोपकार व परसेवा के सभी कार्य आते हैं, करने चाहियें। बहुत से लोग करते भी हैं। सबको यह ध्यान रखना चाहिये कि सब मनुष्यों का धर्म एक ही है। संसार में जो धर्म के नाम पर मत-मतान्तरों का जो व्यवहार किया जाता है, वह धर्म न होकर मत-पंथ व सम्प्रदाय हैं। हमें वेद प्रचार से सभी मत-पंथ तथा सम्प्रदायों का सुधार करना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ लिखकर इस अभियान का शुभारम्भ किया था। ऐसा करने से संसार सुख का धाम बन सकता है। मनुष्य को वेदादि सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये। स्वाध्याय से मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य का बोध होता है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष है। इस जीवन में हमें धर्म, अर्थ व काम का सेवन करना है जिसको करते हुए हमें जन्म व मरण के बन्धन से छूटना है। इसी को मोक्ष कहते हैं। मोक्ष का यथार्थ स्वरूप वैदिक धर्म की शरण में जाने पर ही विदित होता है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के नवम् समुल्लास में मोक्ष के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला है। मोक्ष के सुखों तथा मोक्ष प्राप्ति के साधनों की चर्चा भी की है। यह मोक्ष ही सभी आत्माओं का लक्ष्य है। इस कारण वैदिक धर्म सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम है जो सभी मनुष्यों को मोक्ष अर्थात् सब प्रकार के आनन्द से परिचित करा कर उसे मोक्ष को प्राप्त करने के साधनों से परिचित कराते हैं।

वैदिक धर्म के पालन से अनेकानेक लाभ होते हैं। इसका ज्ञान वेद वैदिक साहित्य सहित सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ से होता है। सभी को वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिये और वैदिक धर्म का पालन करना चाहिये। इससे सभी को सुख व सन्तोष प्राप्त होगा तथा मृत्यु के बाद भी श्रेष्ठ मनुष्य योनि में जन्म होकर मुक्ति प्राप्त होगी। अपने जीवन में मनुष्य श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण कर सकेगा जिससे उसकी इस जीवन तथा उसके बाद भी यश व कीर्ति में बनी रहेगी जैसी की राम, कृष्ण व दयानन्द आदि महापुरुषों की है। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य