राजनीति

गणतंत्र दिवस पर दिल्ली हिंसा से देश शर्मसार- जिम्मेदार कौन ?

जब से मोदी सरकार ने देश के किसानों के हित में तीन कृषि विधेयकों को संसद से पारित करवाया है तभी से मोदी, भाजपा विरोधी किसान नेता व दलों ने किसानों के नाम पर जिस प्रकार से आंदोलन चलाया वह अराजकतापूर्ण शुरू से ही था। एक कैलेंडर बनाकर सुनियोजित तरीके से दिल्ली में 26 जनवरी के दिन लाल किले की हिंसा सहित कई जगहों पर हिंसा की साजिशें रची गयी। किसान आंदोलन में शुरूआत से ही अराजकतत्व घुस चुके थे और इन अराजकतत्वों को देश के सभी मोदी विरोधी दलों का खुला सहयोग प्राप्त हो रहा था। आज जो राहुल गांधी यह कह रहे हैं कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता असल में ऐसे ही तत्व किसानों को भड़काने में लगे रहे थे। आज दिल्ली में गणतंत्र दिवस के दिन जिस प्रकार से हिंसा को अंजाम दिया गया है उसको भडकाने में कांग्रेस नेता राहुल गांधी व प्रियंका वाड्रा तो है ही साथ ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी किसानों को भड़काने में कोई कोर कसर नहीं बाकी रखी थी।
आज वह लोग मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहें होंगें जो किसी न किसी प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भारत सरकार की छवि को देश ही नहीं अपितु पूरी दुनिया के सामने खराब करना चाह रहे थे। आज वह सभी दल पूरी तरह से बेनकाब हो चुके हैं जो किसानों की आढ़ में अपनी राजनीति को चमकाना चाह रहे थे। दिल्ली की हिंसा में राहुल गांधी व अरविंद केजरीवाल सहित सभी किसान नेताओं व विपक्ष्ी दलों के नेताओं की भड़काऊ बयानबाजियां ही जिममेदार हैं। यह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ही थे जिन्होेंने दिल्ली विधानसभा में तीनोें बिल फाड़कर अपनी शपथ का वादा तोड़ा था। यह आम आदमी पार्टी ही थी जिसने कहा था कि जो किसान दिल्ली के अंदर आयेंगे उनका वह स्वागत करेगी। दिल्ली हिंसा की जांच मेें इन सभी दलों के नेताओं व उनके बयानों की गहराई से जांच कर कार्यवाही होनी ही चाहिए।
जब देश अपना 72वां गणतंत्र बना रहा था उस समय पूरे विश्व की निगाहें भारत की तरफ रहती हैं किसाना आंदोलनकारियों के बीच में जिस प्रकार से घुसकर खालिस्तानी समर्थकों ने अपना झंडा फहराया व लाल किले के अंदर तोड़फोड़ करी और पुलिस के जवानों पर जिस प्रकार से टैªक्टर चढ़ाने का प्रयास किया गया तथा महिला पुलिसकर्मियों और मीडिया कमिर्यों के साथ अभद्रता की गयी वह बेहद शर्मनाक व दुःखद क्षण थे। 26 जनवरी के दिन पूरा विश्व भारत की दिव्य एवं भव्य परेड को देखता है आज पूरा भारत का शर्मसार हो रहा है। जिन आदोंलनकारियों ने लाल किले में सुनियोजित तरीके से तोड़फोड़ की है वह असली किसान तो नहीं थे। 26 जनवरी के दिन दिल्ली में किसानों की टैªक्टर परेड का आयोजन केवल और केवल हिंसा फैलाने के लिए किया गया था। दिल्ली में हिंसा के बाद अब सभी किसान नेता व उनके समंर्थक पूरी तरह से बेनकाब हो चुके हैं। देश के तथाकथित मोदी विरोधी राजनैतिक दल अभी भी किसानों को लगातार भड़काने में लगे हैं।
यह किसान आंदोलन शुरू से ही सुनियोजित तरीके से अराजकता की भेट चढ़ चुका था। सरकार से बैठकों का नाटक रचा गया था। जिस दिन सरकार व किसानों की बैठक होने वाली होती थी उसके एक दिन पहले ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी व अरविंद केजरीवाल सहित सभी वे नेता जो अपने आप को किसानों का सबसे बड़ा मसीहा मानते थे ऐसे बयान देते थे व टिवटर पर चिडिया उड़ाते थे कि जिससे पता चल जाता था कि सरकार और किसानों के बीच जो बैठकें चल रही है उससे किसान आंदोलन नहीं समाप्त होने वाला। किसानों को भड़काने के लिए राहुल गांधी कविता लिखने लग गये थे वीर तुम बढ़े चलो, वहीं केजरीवाल सिंधु बार्डर पर उनका हौसला बढ़ाने के लिए चले जाते थे। महाराष्ट्र में शरद पवार सरीखे नेता भी किसान आंदोलन में कूद पड़े। अन्ना हजारे में भी नई जान आ गयी। जिसे देखो वहीं किसानों का परम हितैषी बनने निकल पड़ा था। कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता था उप्र में सपा नेता अखिलेश यादव व बहिन मायावती सहित सभी छोटे दलों के नेता किसानों के रहनुमा बनने के लिए लगातार ओछी बयानबाजी कर रहे हैं
आज जब दिल्ली में देश को पूरे विश्व में शर्मसार करने वाली घटना हो गयी और लगभग तीन सौ पुलिसकर्मी घायल हो गये तथा निजी व सरकारी सम्पति को नुकसान पहंुचा दिया गया उसके बाद भी यह दल सुधर नहीं रहे हैं। दिल्ली हिंसा के बाद सभी किसान हितैषी नेता व भड़काऊ बयानबाजी करने वाले नेता दिल्ली पुलिस का मनोबल बढ़ाने की बजाय उसको ही फेल बता रहे हैं अब तक के पूरे घटनाक्रम में दिल्ली पुलिस ने बहुत ही धैर्य के साथ काम किया है अगर दिल्ली पुलिस ने अपनी सुरक्षा के मददेनजर एक भी गोली चला दी होती तो आज यही नेता मोदी जी को किसानों का हत्यारा कहकर पूरे देशभर में उपद्रव कर रहे होते। दिल्ली पुलिस ने बहुत ही सावधानीपूर्वक काम किया है। जिस दिन राहुल गांधी ने तीन कृषि विधेयकों के खिलाफ एक पुस्तिका जारी की थी जिसका शीर्षक था खेती का खून। उसी समय बहुत बड़ा शक व संदेह पैदा हो गया था कि आखिर इन लोगों के मन में क्या चल रहा है ? आज खेती का खून पुस्तिका का सच सामने आ गया है। मोदी विरोधी तत्व हर हालत में किसानों का खून बहना देखना चाहते थे जिस पर वह कामयाब तो नहीं हो पाये है लेकिन बेनकाब जरूर हो गये हैं। दिल्ली में किसानों के नाम पर हिंसा के बाद किसान व नेताओं के प्रति जो सहानुभूति बन रही थी अब वह भी समाप्त होती दिख रही है। यह हिंसा किसान आंदोलन के लिए नुकसानदायक साबित होगी। जो लोग आज दिल्ली में हिंसा के लिए अब भी केंद्र सरकार व दिल्ली पुलिस को ही जिम्मेदार बता रहे हैं और अपनी जिम्मे दारियों से पल्ला झाड़ रह हैं असली जिम्मेदार वहीं लोग हैं
जब किसान संगठनों के बीच वार्ता चल रही थी उस समय जब धरना प्रदर्शन चल रहे थे उसी समय किसानों के बीच खालिस्तान समर्थक पोस्टर लहराये गये, धारा 370 की वापसी की मांग की गयी थी और दिल्ली दंगों के मास्टरमाइंड उमर खालिद जैसे लोगों को रिहा करने की मांग भी की जाने लगी थी। किसान आंदोलन का खालिस्तान समर्थकोें व शाहीन बागियों, अर्बन नक्सलियों ने एक प्रकार से अपहरण कर लिया था। किसान नेता के नाम पर कुछ लोग पीएम मोदी को भी जान से मारने की धमकी आंदोलन में दे रहे थे। आज सब कुछ सामने आ चुका है।
जब सरकार ने किसानों की दो प्रमुख मांगे मान ली थी और तीन कृषि विधेयकों पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई शुरू हो गयी तथा उसकी कमेटी के सामने भी यह लोग जाने के लिए तैयार नहीं हुए और केवल अपनी जिद पर अढ़े रहे थे उसी समय समझ में आ गया था कि दाल में कुछ तो काला है। लेकिन अब यह तो समझ में आ ही गया सभी देशवासियों को की यहां जो किसान आंदोलन चलाया जा रहा था वहां पूरी दाल ही काली थी। यह सुनियोजित साजिश का आंदोलन था और अब समय आ गया है कि ऐसे अराजक तत्वों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही होनी ही चाहिए। अगर कोई राज्य सरकार किसानों के नाम पर किसानों को गलत जानकारी देकर उन्हें भड़काती है व उपद्रवियों को राजनैतिक व संवैधानिक सरंक्षण कवच देने का प्रयास करती हैं तो उन राज्य सरकारों के खिलाफ भी कड़े कदम उठाने चाहिए। अब इन तत्वों के आगे केंद्र व राज्य सरकारों को कतई नहीं झुकना चाहिए। किसान आंदोलन के नाम पर अब तक 50 हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हो चुका है। लाल किले को तहस नहस किया गया और उसकी छवि को धूमिल किया गया है इस नुकसान की भरपाई तथाकथित किसान नेताओं व उनके रहनुमा बन रहे नेताओं से ही वसूलनी चाहिए। इन लोगों ने अभी तक खुले मन से न तो हिंसा की आलोचना की है और नहीं माफी मांगी है। आंदोलन भी चालू रखना चाह रहे हैं लोकतंत्र का मजाक इन तत्वों ने बनाकर रख दिया है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर यह देश कब तक गुंडागर्दी को सहन करता रहेगा? सभी किसान नेताओं के खिलाफ कड़ी कार्यवाही तो जरूरी है जो ट्रैक्टर परेड का नेतृत्व व आयोजन कर रहे थे और जिन लोगों ने किसानों से 26 जनवरी को लाठी- डंडा लेकर आने की बात कहीं थी ऐसे तत्वों के खिलाफ कठोर से कठोरतम कार्यवाही का समय आ गया है।
— मृत्युंजय दीक्षित