कविता

परम सत्य

गहरी नींद की सच्चाई  मृत्यु है।
तल्लीनता का अनुभव,शांत चित
शून्य ही   ••••••
उलझनो की आपाधापी से विमुख
दुनिया से दूर ,मिथ्या बंधन त्याग
ईश्वर से मिलकर
संसार से  किनारा कर
बंद आँखे न खुल पायेगी।
होठो से न शब्द निकलेगे।
अंतिम यात्रा ही परम सच है।
जगत दुखो की खान ,ईश्वर  मे विलीन हो
सच्चा सौदा जान
मृत्यु ही सुकून की निद्रा
मिथ्या जगत आधार
कर ईश्वर  की बंदगी
मिटे कलेश विचार

— आकांक्षा

डॉ. आकांक्षा रूपा चचरा

शिक्षिका एवम् कवयित्री हिंदी विभाग मुख्याध्यक्ष, कवयित्री,समाज सेविका,लेखिका संस्थान- गुरू नानक पब्लिक स्कूल कटक ओडिशा राजेन्द्र नगर, मधुपटना कटक ओडिशा, भारत, पिन -753010