कहानी

पहला प्यार

दिल्ली की जबरदस्त ठंड में भावना दोपहर को भी रजाई में घुसी थी, उम्र भी दस्तक देकर समझा रही थी, चौकस रहो, कई बीमारियों के सर्टिफिकेट धारण कर चुकी हो। तभी टेबल पर रखा मोबाइल घनघना उठा, अब मजबूरी थी, हाथ बाहर निकाला जाए।
“हेलो, कौन बोल रहा है ? “
“पहचानो”
“अरे वाह, प्रेम तुम, आवाज़ में जितनी भी कंपकपी आये, पर जानते हो, मैं तुम्हे पहचान ही लूँगी।”
“हां, मैं तुम्हारा प्रेम, अपने घर गया था, फिर तुम्हारो यादों ने कदम तुम्हारे घर तक पहुँचा दिया, भाभी से फ़ोन नंबर लिया, अब इस उम्र से शर्म लिहाज का दामन छोड़ बैठा। पता है, जब जब वैलेंटाइन वीक आया, मैं तुम्हारे अहसास में जीता रहा, इस बार अपने दिल के वो अछूते कोने से वादा किया था कि एक और अनछुए अहसास से इस बार मिला दूंगा।”
“कैसी हो भावना, जानता हूं, शारीरिक रूप से तुम किसी की हो लो, पर वो एक सूक्ष्म सा अहसास जो मैंने तुम्हारे दिल मे बरसो पहले रक्खा था, वो फूलो की सुगंध, नदी का बहाव, जंगल के झरने की तरह जीवंत रहेगा।”
“ओ, प्रेम, एक लंबे अंतराल के बाद इतनी मीठी मीठी शहद सी बातें एक सपना ही लग रही हैं, पता नही क्यों अब तो दिल सोचने लगा, तुम सामने आकर यूँ ही बोलते रहो और मेरी सांस रुक जाए।”
“हठ, आज भी वही की वही, अब तो बड़ी हो जाओ।”
पता है आज मेट्रो में तुम्हारे घर जा रहा था, बगल में एक लड़का वॉट्सएप पर मेसेज करते हुए थोड़ा घबराया हुआ था, लड़की ने उसके वॉट्स-एप स्टेटस को देखकर थम्स-अप का इशारा किया था और डीपी की भी तारीफ की थी, लेकिन…इसके आगे।
शायद दफ़्तर के लिए तैयार होते वक़्त एक निगाह घड़ी की तरफ थी, दूसरी फोन पर। लेकिन नेटवर्क ग़ायब। देश को फोर-जी, फाइव-जी में ने जाओ तो कोई जी काम नहीं करता, और न कहीं जी लगता है।
उसका जी उचट गया।
मेट्रो में बैठते हुए बस गुड-मॉर्निग लिखा था उसने। नज़रें बदस्तूर मोबाइल पर जमी रहीं। प्रतीक्षारत। पहले मेसेज डेलिवर हुआ, पहले एक टिक का निशान, फिर दो नीली धारियां…।
उसका प्यारा सा मदहोश सा चेहरा बता रहा था, प्रेम में डूबा है, मुझे ऐसे लोग बहुत प्यारे लगते हैं।”
सुनो फ़ोन काटती हूँ, डोर बेल बज रही।
और वो दिन भावना हर गाना गुनगुनाते रही, “रंगीला रे, मेरे मन मे यू जगी है ये उमंग”
श्रीमान जी भी पूछते रहे, “वाह, आजकल मूड बड़ा आशिकाना हो रहा है।”
रात को नींद भी भावना से जबरदस्ती अतीत की रोमांटिक कहांनी सुनाने पर जोर दे रही थी। और भावना पहुँच गयी पड़ोसन भाभी के घर, वहां उनके भाई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए आये थे। भावना भी उस समय बैंक पीओ की परीक्षा देने वाली थी। जब दिमागी स्तर जब एक ही हो तो मज़ा ही आता है। दोनो कठिन से कठिन प्रश्न ढूंढकर एक दूसरे को हराना चाहते थे, और दोनो ही जीत जाते थे।
इसी बीच कब दोनो अपना दिल हार बैठे, उन्हें समझ ही नही आया।
दिल्ली में घूमने में मज़ा आने लगा। कीर्ति नगर की एक कॉफी शॉप में अक्सर दोनो शाम को बैठने लगे। सिर्फ दो कप कॉफी, दो हाथ, दो आंखे बाते करने में मशगूल रहते, कभी कभी होंठ भी बोलने लगते। फरवरी का महीना आ चुका था, प्रेम वैलेंटाइन डे पूरे जोर शोर से मनाने की तैयारी में था। अब भावना किसी भी हालत में मना नही कर सकी, दोनो एक दूसरे के दिल मे अधिपत्य जमा चुके थे।
पहले दिन प्रेम ने उसे रीगल पर कॉफ़ी हाउस में वैलेंटाइन डे के रोज डे पर लाल गुलाब देकर स्वागत किया और चॉकलेट केक खिलाया।
दूसरे दिन दोनो ने बुद्धा गार्डन में प्रोपोज़ डे मनाया।
तीसरे दिन घर पर ही चुपके से चॉकलेट देकर चॉकलेट डे मनाया गया।
चौथे दिन पड़ोस की भाभी ने ही एक टेडी बियर घर आकर दिया, जिसमे कोने में लिखा था……फ्रॉम प्रेम।
भावना भावनाओ में बहती रही।
पांचवे दिन प्रेम ने प्रॉमिस डे पर उससे प्रॉमिस लिया, शादी मुझसे ही करोगी।
छठवें दिन फिर दोनो कीर्ति नगर कॉफी हाउस में चुपके चुपके के दूसरे की बाहों में थे।
नियम के अनुसार ही चल रहे थे तो सातवे दिन एक पिक्चर हाल में किस डे भी मना लिया।
अब आया प्रेम और भावना का वैलेंटाइन डे समारोह, दोनो ने बढ़िया रेस्टॉरेंट में कैंडल लाइट डिनर किया, और दोनो ने वादा किया, हर वैलेंटाइन वीक ऐसे ही मनाया जाएगा।
दो दिन दोनो आराम करते रहे, मोबाइल तब तक नही आया था। तीसरे दिन भाभी से खबर लगी उनकी मम्मी बहुत बीमार है, भाई, बहन आज ही जा रहे हैं।
फिर समय का पहिया अपनी रफ्तार पर आ गया, प्रेम की मम्मी नही रही, वो वहीं रह गया, पापा की देखभाल करनी थी। और इधर भावना की भावनाओ को आहत करके उसको दुल्हन के वेश में सबने ससुराल भेज दिया। मां, पापा बहुत खुश थे, रेलवे अफसर लड़का मिला है, राज करेगी।
अतीत के पन्ने खुलते रहे और पता नही कैसे सवेरा हो गया।
भावना कहीं दूर से एक गाने की आवाज़ सुन रही थी……..तुझको पुकारे मेरा प्यार आजा, मैं तो मिटा हूँ तेरी चाह में।
श्रीमान जी सुबह भावना को जगा रहे थे, “अरे जानेमन, आज चाय नहीं मिलेगी क्या?”
अचानक भावना नींद से जगी, “जरूर मिलेगी, आज तो बढ़िया चाय और नाश्ता भी मिलेगा।”
और वो सोचने लगी, “आज भी वैलेंटाइन डे है, मैं कितनी खुशनसीब हूँ, अंदर बाहर हर तरफ मेरे प्यारे प्यारे लोग हैं, चल दी, गोभी के पकोड़े और चाय बनाने।”
— भगवती सक्सेना गौड़

*भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर