कविता

जीवन की दो राह है

जीवन की दो राह है,
एक राह है तेरे वास्ते।
तय करना तुमको ही है,
सच है या झूठ तेरे वास्ते।

ये जीवन इंतिहान लेती है,
न्याय-अन्याय के रास्ते।
चलना तो तुमको ही है,
चूनो कौन है तेरे वास्ते।

मानव बनो या दानव बनो,
एक तो बनना होगा ही।
क्या बनोगे तुम सोचो,
इस जीवन के वास्ते।

मेरी मानो एक बात सुनो,
तुम मानव हो कोई और नहीं।
जीवन गुजरे ऐसा की गर्व रहे,
जियो मानवता के तुम वास्ते।

भला करो या बुरा करो,
बस एक है तेरे वास्ते।
जीवन की दो राह है,
एक राह है तेरे वास्ते।

अमरेन्द्र पचरुखिया,फतुहा,पटना,बिहार।
(स्वरचित एवं मौलिक)

अमरेन्द्र कुमार

पता:-पचरुखिया, फतुहा, पटना, बिहार मो. :-9263582278