कविता

रूठा किसान

टूट रहा है अब अभियान,
हम तो भारत के सपूत महान।
पढाई लिखाई सब छोड़कर,
हल चलाते बने किसान।

कर्म करने को तत्पर हैं,
हमारे घर तो छप्पर हैं।
अन्न  तो खूब उगाते ,
खुद भूखे पेट सो जाते।

पहचान अब रही नहीं,
मूल्य कभी हमें मिली नहीं।
धरती सूखकर बंजर हुआ,
मौत से बदतर  मंजर हुआ।

मुस्कान हमारी गुमी हुई,
लतपथ मिट्टी सनी हुई।
धड़कन तेज अब दौड़ रही ,
सांसे भी तो अब तोड़ रही।

आंधियां जब-जब चलती है,
किस्मत हमारी बदलती है।
फसल के क्या हालत हुए,
हम तो एकदम बर्बाद हुए।

नन्हें नन्हें पौधों को,
सदा हमने सहलाया था,
उन्नत खेती के नाम पर,
मन को  हमने बहलाया था।

रोटी देने के लिए,
सर्द रात में जागी है।
मेहनत का फल ना मिले,
हम तो इसके भागी हैं।

कितने बैल लाए  थे हमने,
अनेक फसल लगाई हमने।
धरा देख अब रोने लगी,
कितने आंसू बहाए  हमने।

रोज-रोज हम काम करते,
कभी नहीं आराम करते।
पोषण पूरा करते हैं,
बलवान बने हम लड़ते हैं।

ईख की फसल लगाते हैं,
मीठा रस बहाते हैं।
पर कड़वी है की खट्टी है,
इसको कौन बताते हैं।

पगड़ी लगाकर हम काम करते,
धूप छांव से हम नहीं डरते।
मौसम की मार हमेशा सहते,
टमाटर हमारी बाजार में बहते।

एक रुपया दो रुपया मोल है क्या,
कैसे ले परोपकार है क्या।
थक गए अब हम खेती करके,
नहीं करेंगे अब जीवन भर के।

मेहनत करके कुछ नही मिला,
फसल पर पड़ते हमेशा ओला ।
बीमारी भी चट कर जाते।
मंहगी दवाई के लिए माथ नवाते।

व्यापारी अपनी दुकान सजाते,
दो से तो दो सौ बनाते।
महंगाई को खूब बढ़ाते,
किसान के ऊपर भारी पड़ जाते ।

किसान आखिर अब अढ़ता है,
महंगाई से लड़ता है।
किसान को अब कोई नहीं पूछता,
माटी पुत्र को अब कुछ नहीं सुझता।

नई फसल को गढता  है,
मजबूरी में आगे बढ़ता है।
पेट की अगन है भारी,
कौन करे परवाह हमारी।

रुखा सूखा खाकर जीते,
मौसम के मार को हम पीते।
कठिन डगर में चलते हैं,
खाली हाथ अब मलते हैं।

हमको अब आवास नहीं,
दुनिया में अब प्रयास नहीं।
हमारे लिए विकास नहीं,
कितना करे हमारे लिए अवकाश नहीं।

दूर बड़ी जब है दिल्ली ,
चूसक कीड़ा और है  इल्ली ।
लोग उड़ाते है खिल्ली ,
सब कहते है शेखचिल्ली ।

— कमलेश “लोहा”

कमलेश 'लोहा'

कमलेश्वर प्रसाद कुर्रे सूरजपुर छत्तीसगढ़ M- 6264133414