तलाश
मोहन के दोस्त जुआ खेलने और शराब पीने के लिए जगह तलाश रहे थे। जगह तलाश कर दीपावली के त्यौहार के दिन बैठ गए। उस दिन मोहन का बालक दीपावली पर पटाखे लाने के लिए अपने पिता का इंतजार कर रहा था। वो बाहर बैठा हुआ ऊपर आकाश मे उड़ते पंछी को देख रहा था। वो दाना चुनकर लाना जाकर पंछी अपनी चोंच मे दाना लेकर चूजों को खिला रहा था। पंछी के अभिवादन में चूजे पंखों को फड़फड़ा कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि मानों उनके यहां रोज दिवाली हो। ठीक उसी पेड़ के नीचे बने घर मे मोहन की पत्नी अपने भूखे बच्चों के लिए दीपावली के दिन अपने पति का इंतजार इस उम्मीद से कर रही थी की वो अपने बच्चों के लिए कुछ न कुछ तो जरुर लाएंगे। किन्तु शराब के नशे मे धनतेरस पर जुए मे हारकर लड़खड़ाते कदमों से घर आने पर मोहल्ले वाले करने लगे मोहन को गालियों से अभिवादन। मोहन का बालक बैठा हुआ सोचने लगा कि अच्छा है पंछी शराब नहीं पीते। नहीं तो उनके भी हालात मेरे पिता की तरह हो जाती। मोहन के बच्चे दीपावली पर्व पर पेड़ के नीचे बने घर मे भूखे सो गए थे। मोहन अब इस दुनिया मे नहीं रहा किन्तु उसकी मां मजदूरी करके अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही। और सोच रही है कि पति शराब नहीं पीते तो बच्चे अपने पिता के संग पटाखे और रोशनी के आज दीप जलाते। मोहन की पत्नी बच्चों को शिक्षा हेतु स्कूल तलाश रही है ताकि वे मोहन की तरह आचरण न कर सकें।
— संजय वर्मा “दृष्टि”
