मुझे भी इश्क हुआ था
उसे देखा था,
जेठ के आखिरी मंगलवार को
जब मै गया था,
महाकाल के दरबार को
वो भी वहां आई थी ,
अपने साथ अपनी,
माँ को भी लाई थी,
उसे देखा तो ऐसा लगा,
जैसे सचमुच कोई अप्सरा,
आई हो देव दरबार को
मुझे भी इश्क हो गया,
जेठ के आखिरी मंगलवार को
मै लड़का था अच्छा भला,
उसकी मुश्कुराहट ने ऐसा छला,
मैने भी पाल ली मोहब्बत- सी बला,
मुझे क्या पता था,
मेरी किस्मत मे नही है,
वो अबला,
फिर भी मै उस क्षण के लिए,
कैसे शुक्रगुजार करूं महाकाल को
मुझे भी इश्क हुआ था,
जेठ के आखिरी मंगलवार को,
जब मै गया था,
महाकाल के दरबार को
— प्रशांत अवस्थी “रावेन्द्र भैय्या”
