कविता
एक अचम्भा मैंने सुना वक़्त की
पैसों से तकरार हो गई
कीमती हूँ मैं या मेरे अपने
जरा सी बात बढ़कर रार हो गयी
पैसों ने कहा वक़्त से
मुझसे बड़ा यहाँ कोई नहीं
खुशियाँ खरीद सकते हैं पैसों से
मेरी हैसियत अपनों से बड़ी हो गयी
वक़्त ने कहा फिर ठीक है
चलो आज एक वादा करते हैं
मैं क्या हूँ तुम्हें पता लग जायेगा
कल जब वक़्त हाथ से निकल जायेगा
न होगा तेरे साथ कोई अपना
क्या पैसों से सब खरीद पायेगा
क्या करेगा उन पैसों का जब
तेरा अपना ही तुझे रुलाएगा
बहुत धनवान आये गए
इठलाते थे जो अपने पैसों पर
किसी की जरूरत नहीं मुझे
पैसा ही मेरे काम आएगा
जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर
न धन काम आया न समाज
पड़ा है बिस्तर पर अकेला राह देखता
कौन मेरी चिता में आग लगाएगा
माना कि पैसा बहुत कुछ है
पर सब कुछ कैसे हो पायेगा
धन की अहमियत अपनी जगह
अपनों की कद्र वक़्त तुझे समझायेगा
— वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़
