कविता

कविता

एक अचम्भा मैंने सुना वक़्त की
पैसों से तकरार हो गई
कीमती हूँ मैं या मेरे अपने
जरा सी बात बढ़कर रार हो गयी
पैसों ने कहा वक़्त से
मुझसे बड़ा यहाँ कोई नहीं
खुशियाँ खरीद सकते हैं पैसों से
मेरी हैसियत अपनों से बड़ी हो गयी
वक़्त ने कहा फिर ठीक है
चलो आज एक वादा करते हैं
मैं क्या हूँ तुम्हें पता लग जायेगा
कल जब वक़्त हाथ से निकल जायेगा
न होगा तेरे साथ कोई अपना
क्या पैसों से सब खरीद पायेगा
क्या करेगा उन पैसों का जब
तेरा अपना ही तुझे रुलाएगा
बहुत धनवान आये गए
इठलाते थे जो अपने पैसों पर
किसी की जरूरत नहीं मुझे
पैसा ही मेरे काम आएगा
जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर
न धन काम आया न समाज
पड़ा है बिस्तर पर अकेला राह देखता
कौन मेरी चिता में आग लगाएगा
माना कि पैसा बहुत कुछ है
पर सब कुछ कैसे हो पायेगा
धन की अहमियत अपनी जगह
अपनों की कद्र वक़्त तुझे समझायेगा

— वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

*वर्षा वार्ष्णेय

पति का नाम –श्री गणेश कुमार वार्ष्णेय शिक्षा –ग्रेजुएशन {साहित्यिक अंग्रेजी ,सामान्य अंग्रेजी ,अर्थशास्त्र ,मनोविज्ञान } पता –संगम बिहार कॉलोनी ,गली न .3 नगला तिकोना रोड अलीगढ़{उत्तर प्रदेश} फ़ोन न .. 8868881051, 8439939877 अन्य – समाचार पत्र और किताबों में सामाजिक कुरीतियों और ज्वलंत विषयों पर काव्य सृजन और लेख , पूर्व में अध्यापन कार्य, वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन यही है जिंदगी, कविता संग्रह की लेखिका नारी गौरव सम्मान से सम्मानित पुष्पगंधा काव्य संकलन के लिए रचनाकार के लिए सम्मानित {भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ }साझा संकलन पुष्पगंधा काव्य संकलन साझा संकलन संदल सुगंध साझा संकलन Pride of women award -2017 Indian trailblezer women Award 2017