बोतलबंद पानी पर अत्यधिक निर्भरता स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि अगर प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो 2060 तक दुनियाभर में प्लास्टिक कचरे की मात्रा तीन गुनी हो जाएगी। प्लास्टिक प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा बोतलबंद पानी से जुड़ा है, जिसके प्रबंधन और पुनर्चक्रण की दिशा में गंभीर होने की आवश्यकता है।
दरअसल शहरीकरण के विस्तार, भूमिगत जल में प्रदूषक की बढ़ती मात्रा, पर्यटन में वृद्धि और जीवनशैली में आए बदलाव के कारण बोतलबंद पानी की मांग और खपत तेजी से बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक वैश्विक बोतलबंद पानी के बाजार का आकार 509 अरब अमेरिकी डालर तक पहुंच सकता है। बोतलबंद पानी उस आबादी की प्यास बुझाने का आसान जरिया बन चुका है, जो बाहर घूमते समय या यात्रा के दौरान सुविधा और तुरंत उपलब्धता के कारण इसे प्राथमिकता देते हैं। कुछ दशक पहले तक लोग अपनी
प्यास सार्वजनिक चापानलों से आसानी बुझा लेते थे, मगर पानी में फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसे प्रदूषकों की बढ़ती मात्रा ने उन्हें धीरे-धीरे बोतलबंद पानी पर अधिक निर्भर बना दिया है। हालांकि पानी की जिन बोतलों को हम आसानी से खरीदकर अपनी प्यास बुझा लेते हैं, उसके निर्माण, परिवहन और लैंडफिल से पर्यावरण को गहरा नुकसान पहुंचता है। एक प्लास्टिक की बोतल बनाने में लगभग तीन लीटर पानी का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसके उच्च ‘जल पदचिह्न’ को दर्शाता है। वहीं, इसके निर्माण से लेकर बाजार के कोने-कोने तक पहुंचाने की प्रक्रिया में ईंधन की खपत भी होती है, जो न सिर्फ ऊर्जा स्रोतों पर दबाव डालती है, बल्कि वायु प्रदूषण का कारण भी बनती है। यही नहीं, प्लास्टिक की बोतल सामान्यतः एकल उपयोग में ही लाई जाती है और इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाती है। रीसाइक्लिंग प्रक्रिया तक न पहुंच पाने वाली बोतलें भूमि, जल एवं वायु प्रदूषण में योगदान देती है। प्लास्टिक की बोतलों को सड़ने में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं, तब तक ये पारितंत्र और मानवता को गहरे तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं। ये टूटकर माइक्रोप्लास्टिक के रूप में मृदा और जलस्रोत में समा सकते हैं, जिससे क्रमशः उत्पादित खाद्य पदार्थों और पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। दूसरी तरफ, चिकित्सकों द्वारा प्लास्टिक की बोतल में लगातार पानी पीने से मना किया जाता है, क्योंकि इससे शरीर में माइक्रोप्लास्टिक घुलने का खतरा बढ़ जाता है।
बोतलबंद पानी पर अत्यधिक निर्भरता स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है। इसकी जगह पुनः प्रयोज्य पानी की बोतलें खरीदना और जल पुनर्भरण स्टेशनों से इसे रिफिलिंग करवाने की आदत पर्यावरण को प्लास्टिक प्रदूषण के खतरे से कुछ राहत ज दिला सकती है।
— विजय गर्ग
