आंख मूंद न अपना कहो
कौन हितैषी,दुश्मन कौन
ये हम को पहचानना होगा,
किसी की झूठी बातों को
आंख मूंद नहीं मानना होगा,
बनके आएंगे बहुत हितैषी,
मंशा पाले वो कैसी कैसी,
हो सकता है वो बड़ा दलाल,
कहेंगे खुद को बहुजन लाल,
चढ़ा लोगे जब उसे नजर में,
निकल पड़ेगा सौदे की सफर में,
अच्छे से पहचानो उसको,
मान रहे हो अपना जिसको,
जो करता है संग रह अय्यारी,
पड़ेगा समाज पर वो तो भारी,
सरल राह यूं ही न मिलेंगे,
छुप रिपुओं से गले मिलेंगे,
बढ़ जाता जब प्रभाव व दौलत,
फिर दुश्मन से मिलेगा उसी बदौलत,
महापुरुषों का पहले लेगा नाम,
गड्ढे खोदने खातिर समाज में
करेगा वो हर काम तमाम,
एन वक्त पर धोखा देकर
बन सकता है वो दरीबाज,
बहुतों में हम देख चुके हैं
दलाली वाला ये अंदाज,
तर्क करो व सतर्क रहो,
बारीकी से पहचानो सबको
आंख मूंद न अपना कहो।
— राजेन्द्र लाहिरी
