ऊंचाई
ऊंचे पहाड़ पर पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो कफ़न की तरह सफेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद -बूंद रोती है।
सच्चाई यह है कि
केवल ऊंचाई ही काफी नहीं होती,
सबसे अलग – थलग, परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा- बंटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना
पहाड़ की महानता नहीं मजबूरी है।
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना।
— हेमंत सिंह कुशवाह
