अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे
“नमस्ते अंकल जी, पापा की तबीयत ठीक नहीं है| आप भीतर चलकर उनके कमरे में ही उनसे मिल लीजिए|”
“क्या बात है भई, आपके साहबजादे बड़े बदले-बदले से जान पड़ रहे हैं!” बेटे की ओझल होती पीठ पर नजरें गड़ाये हुए श्याम ने व्यंग्यपूर्वक अपने जिगरी मित्र रामलाल से पूछा|
“आओ श्याम! आखिर आज रास्ता भूल ही गए |”
पोता पानी और बेटा चाय-नमकीन लेकर एक ही साथ कमरे में प्रविष्ट हुए। चाय रखकर बेटे ने विनम्रता से कहा, “कुछ और तो नहीं चाहिए पिता जी?” बाहर जाते हुए पलटकर पुनः बोला, “ज्यादा देर नहीं बैठिएगा, पीठ में फिर से दर्द होने लगेगा|” कहते हुए पिता की कमर में बेल्ट बाँधकर चला गया|
श्याम ने अपनी छूट गयी बात को आगे बढ़ाया, “लगता है, दिवा- स्वप्न देख रहा हूँ मैं| पाँच-छह साल पहले तो यह साहब ऊँट-की-सी अकड़ी गर्दन लिए …” श्याम के कुछ और अपशब्द कहने के पूर्व ही रामलाल ने ठहाका लगाया|
“आप हँस रहे हैं, किन्तु इस प्रकार से आपकी सेवा-शुश्रूषा होते देखकर, अभी-भी मैं बहुत अचंभित हूँ!”
“जड़ खोदकर ही मानोगे श्याम!”
“मैं भी तो जानूँ, आखिर बदल कैसे गए बरखुरदार?”
“बढ़ते बच्चों का बाप जो हो रहा है|” गहरी मुस्कान के साथ दोनों मित्र चाय सुड़कने लगे।
— सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
