समुद्र- मंथन – एक सृष्टि के कल्याण की कथा
ऋषि दुर्वासा एक बार जब देवराज इंद्र से,,
भेट करने के उद्देश्य से, स्वर्ग लोक में पधारे,,
देवराज से भेंट करने के उपरांत,ऋषिवर ने,
एक दिव्य पुष्प माला इंद्र को प्रदान की,,
अपने आशीष के रूप में परंतु देवराज इंद्र
थे, अपने स्वर्ग लोक के ऐश्वर्य के अहंकार में,,
स्वर्ग लोक के अधिपति के पद के मद में आकर
देवराज इंद्र ने ऋषिवर के आशीष का अपमान किया
दिव्य पुष्प माला को, इंद्र ने अस्वीकार किया !!
महर्षि दुर्वासा जो, महादेव शिव शंकर के,,
रुद्र अंश थे, ऋषिवर ने, देखा ज़ब अपना और,
अपने आशीष का अपमान होते हुए, तो,,
उस महान तपस्वी को, रूद्र सा महा भयंकर क्रोध आया
क्रोध में आकर ऋषि दुर्वासा ने इंद्र को अपने तपोबल से,,
शक्तिहीन और श्रीहीन होने का श्राप दिया !!
दुर्वासा ऋषि के श्राप करण हीं देवी लक्ष्मी को,
बैकुंठ का त्याग करके, विशाल समुद्र में, निवास करना पड़ा
स्वर्ग लोक जब श्रीहीन हुआ और देव गण शक्तिहीन हुए,,
इस विकट समस्या के निवारण के लिए,,
देव गण ब्रह्मा देव के साथ श्री हरि की शरण में पहुंचे,
करने समस्या का समाधान, श्री हरि ने देवताओं को,,
असुरों के संग समुद्र मंथन करने का सुझाव दिया !!
देवताओं ने असुरो को, अमृत देने का प्रलोभन देकर,,
असुरो को समुद्र मंथन के लिए तैयार किया !!
आरंभ हुआ समुद्र मंथन मथानी के रूप में,,
मंदराचल पर्वत का उपयोग हुआ,,
कच्छप का रूप लेकर श्री हरि विष्णु ने,
मंदराचल पर्वत को सहारा दिया
जेवरी के रूप में नागराज वासुकि ने, भी अपना सहयोग दिया !!
देवताओं ने पकड़ा नागराज वासुकि के पूछ का छोर
और असुरो का ध्यान रहा वासुकि के मुख की ओर,,
समुद्र मंथन से सर्वप्रथम हलाहल विष निकाला जो,
मानव जाति एवं सृष्टि के लिए, महाविनाश कारी था,
सृष्टि मे मच गया था हलाहल विष प्रभाव से,
चारों ओर त्राहिमाम -त्राहिमाम,
तब महादेव महाकाल शिव शंकर ने प्रगट होकर,
सृष्टि पर आए इस संकट का निवारण किया !!
सृष्टि की रक्षा के लिए मानव जन की सुरक्षा के लिए,
हलाहल विष को महादेव शिव शंकर ने स्वयं ग्रहण किया !!
और सृष्टि को अमृत का वरदान दिया !!
विष प्रभाव के कारण महादेव का कंठ नीला हो जाने के कारण, देव- दानव मानवो ने, भोलेनाथ को,
नीलकंठ महादेव का नवीन नाम दिया !!
समुद्र मंथन से अन्य कई रत्न प्रकट हुए,,
ऐरावत हाथी,कामधेनु,कल्पवृक्ष ,पांचजन्य शंख
उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा,पद्मराग मणि, पद्मराग मणि
शारंग धनुष, चंद्रमा, अप्सरा रम्भा, वारुणी मदिरा,
जिनको देव और दानवो ने आपसी सहमति से,
आपस में बांट लिया !
समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी का भी बैकुंठ में आगमन हुआ,
समुद्र मंथन के अंत में, भगवान धन्वंतरि अमृत कलश
लेकर प्रकट हुए,, अमृत कलश को देखते ही, देवों और दानवो के बीच लंबा संघर्ष चला अमृत कलश की रक्षा के लिए श्री हरि विष्णु ने फिर मोहिनी अवतार लिया !!
श्री हरि विष्णु ने दानवो को मोहित करके,
अपने रंग और रूप से, देवो को, अमरता का वरदान दिया,,
परंतु स्वरभानु नामक दानव ने, भगवान विष्णु के छल को जान कर, देव रूप धारण कर छल से अमृत पान किया,,
श्री हरि विष्णु को ज़ब स्वरभानु के छल का ज्ञान हुआ
भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से, स्वरभानु शीश काट दिया,,
किंतु अमृत पान के कारण दानव स्वरभानु अमरता को प्राप्त हुआ
इस प्रकार राहु केतु का जन्म हुआ, स्वरभानु का धड़
केतु कहलाया और शीश राहु के नाम से प्रसिद्ध हुआ
तथा समुद्र मंथन से, देवताओं को मिला स्वर्ग लोक का वैभव, हुए शक्ति संपन्न और अमरता का वरदान मिला
देवताओं की अमरता के कारण सृष्टि का भी कल्याण हुआ
— आकाश शर्मा आज़ाद
