अनोखा त्याग
लगभग पाच सौ साल पहले बंगाल के नवद्वीप में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन एक बालक का जन्म हुआ। बालक का नाम विश्वंभर रखा गया। अत्यधिक सुन्दर एवं गौरवर्ण के होने के कारण लोग प्यार से उसे गौरांग भी कहते थे। एक बार बालक गौरांग बाल्यावस्था में नीम के पेड़ के नीचे मिला जिस कारण बालक का एक नाम निमाई भी पड़ गया। निमाई बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के साथ-साथ नटखट स्वभाव के थे और हॅसी मजाक से अपने मित्रों को प्रसन्न रखते थे।
उन दिनों नवद्वीप न्याय शास्त्र के अध्ययन के लिए प्रसिद्ध था। न्याय शास्त्र के साथ संस्कृत व्याकरण भी पढ़ना होता था। उन दिनों छापे खाने नही थे। विद्यार्थियों के पास पुस्तकेें नही होती थीं। आचार्य जी के पढ़ाने के बाद पाठ लिखकर कंठस्थ करना होता था।
निमाई अपने मित्रों के साथ पाठशाला में न्याय शास्त्र का अघ्ययन करने लगे। कुशाग्र बुद्धि के होने के कारण वह सुनकर ही पाठ याद कर लेते थे। निमाई के रघुनाथ नाम के एक मित्र थे। जो बाद में पंडित रघुनाथ नाम से प्रसिद्ध हुए। एक बार आचार्य जी ने रघुनाथ को न्याय सम्बन्धी एक प्रश्न दिया। पूरा दिन सोच विचार करने के बाद रघुनाथ ने प्रश्न का हल निकालकर आचार्य जी को बताया। सायंकाल को जब निमाई ने रघु से पूछा कि वे दिनभर कहॉ थे? रघु ने बताया कि आचार्य जी ने एक प्रश्न दिया था उसका हल खोजने में वे दिनभर व्यस्त रहे। निमाई को उस प्रश्न को जानने की उत्सुकता हुई जिसका हल खोजने में रघु को पूरा दिन लग गया। उन्होंने रघु से प्रश्न पूछा? प्रश्न जानने के बाद निमाई ने तुरंत ही प्रश्न का हल निकाल दिया। इससे रघुनाथ को बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योंकि वह स्वयं को न्यायशास्त्र का सबसे अधिक विद्वान समझते थे।
रघुनाथ उन दिनों न्याय शास्त्र में ‘दाधिति‘ नाम की पुस्तक लिख रहे थे। इस पुस्तक की बहुत अधिक चर्चा हो रही थी। इन्हीं दिनो ंनिमाई भी एक पुस्तक लिख रहे थे। निमाई द्वारा आचार्य जी के प्रश्न का तत्काल हल निकाल देने से रघु के मन में चिंता सताने लगी कि कहीं निमाई की पुस्तक अधिक प्रसिद्ध हो गयी तो उनकी पुस्तक को कोई नही पढ़ेगा। अतः रघु ने मित्र से अपनी पुस्तक दिखाने का आग्रह किया।
निमाई सरल स्वभाव के थे। उनके मन में किसी के प्रति राग द्वेष नही था। वह सभी से प्रेम करते थे। उन्होंनें रघु से कहा कि वे दूसरे दिन शाला आते समय अपनी पुस्तक लेते आयेंगे।
दूसरे दिन पाठशाला आते समय निमाई साथ में अपनी पुस्तक भी लाये और दोनों मित्र नाव से शाला को आने लगे। निमाई खुशी से अपनी पुस्तक मित्र को सुनाने लगे। कुछ देर तक सुनने के बाद रघु चुपचाप रोने लगे। जबकि निमाई अपनी धुन में पुस्तक सुनाये जा रहे थे। किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न आने के कारण जब निमाई ने रघु की ओर देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने रघु से पूछा,” मित्र आप रो क्यों रहे हो?”
रघु ने कहा, ”मित्र मैंनंे बहुत मेहनत से अपनी पुस्तक लिखी थी। लेकिन तुम्हारी पुस्तक सुनने के बाद मुझे यकीन हो गया है कि अब मेरी पुस्तक कोई नही पढ़ेगा। तुम्हारी रचना उत्कृष्ट है। मेरी सारी मेहनत बेकार हो गयी।”
रघु का उत्तर सुनने के बाद निमाई हॅसने लगे। फिर सहसा गम्भीर होकर बोले, ”मित्र तुमने मेरी आखें खोल दी हैं। जब मेरे पुस्तक से मेरे मित्र को ही कष्ट हो रहा है तो शेष लोग कैसे प्रसन्न हो सकते हैं।” यह कहकर उन्होंने पुस्तक गंगा जी में फेंक दी। अगले ही पल पुस्तक गंगा जी की लहरों के साथ आगे बढ़ने लगी। रघु को बड़ा आश्चर्य हुआ कि निमाई ने अपने मित्र की खुशी के लिए अपनी पुस्तक त्याग दी।
आगे चलकर यही निमाई ईश्वरभक्ति की ओर उन्मुख हुए और गृह त्यागकर संन्यास लिया तथा चैतन्य देव के नाम से विख्यात हुए। इनके मित्र रघु उनके शिष्य बन गये।
— तारा दत्त जोशी
