कैसा ये जीवन
कैसा ये जीवन
कि इसमें संतोष नहीं
ईश्वर ने हाथ दिए
हृदय दिया, पेट दिया
दी सुंदर आंखें
परंतु हुजूर को संतोष कहां?
मैं सोचता हूं
मौत के बाद
ये संपत्ति किस काम की
मेरा कोई अधिकार नहीं रहेगा
इस भौतिक संपदा पर
कोई खोज-खबर नहीं
कैसा ये जीवन
कुदरत का करिश्मा
बस और और और…
की चाहत में
हम आत्मसुख खो बैठे हैं
और मृग मरीचिका की तरह
भटक -भटककर
झूठी स्वप्न सामान जिंदगी
जी कर कूच कर जाते हैं ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
