क्या मौसम के निर्धारित माह अपने माह को आगे बढ़ा रहे हैं?
मौसमों में ज्यादा बदलाव यानि अधिक ठंड का अधिकतर प्रदेशों में माइनस के करीब पहुँचना चिंतनीय सवाल खड़े करता है क्या मौसम के निर्धारित माह अपने माह को आगे बढ़ा रहे है । पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण मे बदलाव का बुरा असर लकड़ी पर भी हो रहा है |उसकी प्रकृति बदल रही है और उससे बनने वाले वाधयंत्रों मे वो मधुर स्वर नहीं पायेगे , जो की पहले पाते थे । ये एक चिंता का विषय है|वैज्ञानिक दॄष्टि कोण से भी संगीत थेरेपी द्वारा संगीत सुनाकर पेड़-पोधों,पशु-पक्षियों को पूर्ण स्वस्थ्य एवम विकसित करने के प्रयोग जारी है जिसके सफल परिणाम भी सामने आये है|पर्यावरण मे बदलाव को सुधारने हेतु कारगर कदम उठाना होगा ,इस हेतु वृक्षारोपण ज्यादा करे एवम हरे भरे वृक्षों को कटने ना दे, |ताकि वाधयंत्रों मे वो मधुर स्वर पा सके और ऋतु चक्र सही हो सके|पृथ्वी को बचाने के लिए कुछ तो हमें कराना होगा|पूर्व मे जलवायु पर हुए डरबन अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन मे जलवायु परिवर्तन के संबध मे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुच पाने से जनाक्रोश भी उभर कर सामने आया था | हमें इस बात पर भी गोर करना चाहिए की खाद्दान्न हो या बायो फ्यूल हो या कागज हो हर चीज लकड़ी और उससे पैदा करने वाले जंगलो पर आकर ठहर जाती है | इन वस्तुओं से आगे उपजने वाली जरूरतों को पूरा करने के लिए भविष्य मे कई हेक्टर जमीन की अतिरिक्त आवश्यकता होगी जो की निश्चित तोर पर ही जंगलों को काट कर प्राप्त की जाएगी | आर आर इ के अनुसार सन २०३० अंत गाज उष्ण देशीय (ट्रापिकल ) जंगलों पर गिरेगी जो की पर्यावरण के हिसाब से गंभीर एवं चिंतनीय पहलू है| अधिक जंगल काटने से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन .अधिक मौसम परिवर्तन और सबके लिये कम संपन्नता ही प्राप्त होगी | ये सर्वविदित है कि वृक्षों से ताप का नियंत्रण होता ही है वायुमंडल की विषाक्तता भी कम हो जाती है | जितने अधिक वृक्ष होगें वातावरण उतना ही शुद्ध एवं स्वच्छ होगा |वृक्षों की कमी होने से वन्य प्राणियों की जीवन पर भी प्रश्नचिन्ह लगेगा सो अलग | भविष्य में हरित क्रांति को विलुप्त होने से बचाने हेतु वृक्षारोपण की अनिवार्यता व वृक्षों को काटने से बचाना ही सही तरीका होगा |ताकि ऋतु चक्र एवं तापमान में असमय परिवर्तन न हो पाए |
— संजय वर्मा “दृष्टि”
