कहानी

दिल की टेढ़ी-मेढ़ी राहें

रोहन एक सफल व्यवसायी था, जो अपने काम में इतना व्यस्त था कि उसे अपने जीवन में प्रेम की कमी महसूस नहीं होती थी। प्रेम तो क्या रोहन के पास सुख-दुख की अनुभूति के लिए ही समय नहीं था। सफ़लता का भी अलग ही जूनून होता है। कहा भी जाता है, ’सफ़लता का मोती निष्ठुरता की सीप में पलता है।’ रोहन की व्यावसायिक सफ़लता भी इसी मार्ग की पथिक थी। उसके लिए घर-परिवार तो क्या सब-कुछ उसका व्यवसाय ही था। सफ़लता के पथिकों के लिए सफ़लता भी जश्न मनाने के लिए नहीं, वरन और भी अधिक सफ़लता की सीढ़ी बनने के लिए होती है अर्थात सफ़लता कोई गन्तव्य नहीं, एक मील का पत्थर है जो अगले मील चलने के लिए प्रोत्साहित ही नहीं विवश करती है। रोहन भी सफ़लता का ऐसा ही पथिक था। मानवीय भावनात्मक कमजोरियों को उसने जैसे किसी ताले में बन्द कर दिया हो।
एक दिन, रोहन एक दुर्घटना का शिकार हो गया। अब दुर्घटना तो सफ़ल और असफ़ल व्यक्ति में कोई भेद नहीं करती। दुर्घटना ने रोहन पर सफ़लता हासिल कर ही ली। दुर्घटना में रोहन बाल-बाल बच गया, किन्तु उसे कुछ दिनों के लिए उसके काम के जूनून से अलग रहने को मजबूर अवश्य कर दिया। रोहन को उस दुर्घटना में गंभीर चोट लग गई और उसे अस्पताल में भर्ती होना पढ़ा। अस्पताल में भर्ती होकर रोहन ने अपने व्यवसाय को अस्पताल से दूर ही रखा। उसका विचार था कि दुर्घटना की सूचना व्यवसाय स्थल पर देने से उसके व्यवसाय पर नकारात्मक असर पढ़ सकता है। अतः उसने अपने मैनेजर को केवल इतना ही कहा कि कुछ दिनों के लिए वह व्यवसाय को समय नहीं दे पाएगा। मैनेजर पूरी तरह से संभाले। इस कारण रोहन के पास अस्पताल में किसी का आना-जाना नहीं हुआ। परिवार में तो कोई था ही नहीं, रिश्तेदारों को भी रोहन ने कोई खबर नहीं दी थी।
अपनी अस्वस्थता की स्थिति में वह केवल अस्पताल के कर्मचारियों पर निर्भर रहा। प्रिया उसी अस्पताल में एक स्वयंसेवक के रूप में काम कर रही थी। उसने देखा के रोहन के पास मिलने के लिए कोई आता-जाता नहीं, एस कारण प्रिया ने उसकी देखभाल पर स्वयं ध्यान दिया। प्रिया एक सामाजिक कार्यकर्ता थी, जो अपने काम के प्रति समर्पित थी और समाज के लिए कुछ करना चाहती थी। समाज के लिए कुछ करने के जूनून में ही समाज के सदस्य के रूप में रोहन की देखभाल की। दोनों अपने काम के लिए जुनीनी थे। एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हुए। रोहन की देखभाल करते हुए, प्रिया रोहन की मानवीय भावनाओं का ताला खोलने में सफ़ल हुई और मिस्टर सफ़ल के जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया।
धीरे-धीरे, रोहन और प्रिया के बीच एक गहरा संबंध बनने लगा। रोहन को प्रिया की निस्वार्थता, दयालुता, उदारता, सेवाभाव और समर्पण ने इतना प्रभावित किया कि उसे अपनी सफ़लता की परिभाषा ही निरर्थक लगने लगी। जबकि प्रिया को रोहन की व्यावसायिक सफ़लता और सफ़लता के लिए मोहन के जुनून ने प्रभावित किया। अपनी समाज सेवा के दौरान प्रिया को पैसे की अहमियत भी समझ आ गयी थी। वह समझ चुकी थी कि समाज सेवा भी धन के अभाव में नहीं हो सकती। स्वयंसेवी संगठन व गैर व्यवसायिक संगठन भी किसी न किसी प्रकार से धन के अभाव में मर जाते हैं या निष्प्रभावी हो जाते हैं। अन्यथा उन्हें धनाड्यों के इसारों पर चलना पढ़ता है।
रोहन और प्रिया में धीरे-धीरे एक समझदारी का विकास हुआ। वे एक-दूसरे का सहयोग करते हुए प्यार नाम की भावना से जुड़ गये। एक-दूसरे को समझने और एक-दूसरे की आवश्यकता बन जाने के बाबजूद, उनकी अलग-अलग पृष्ठभूमि और जीवनशैली ने उनके प्रेम को एक चुनौती बना दिया। रोहन के परिवार भले ही न था उसके रिश्तेदारों और समाज ने प्रिया को स्वीकार नहीं किया, जबकि प्रिया के दोस्तों ने रोहन की व्यावसायिक जीवनशैली को गलत ठहराया और रोहन प्रिया के उपयुक्त नहीं लगा। उसके बाबजूद वे दोनों एक-दूसरे के सहयोगी और साथी बनें रहें। दोनों परिपक्व थे और परिपक्व प्रेमी सरलता से दूर नहीं होते। प्रिया और रोहन एक-दूसरे के सम्पर्क में बने रहे। एक-दूसरे का सहयोग करते रहे।
इसी दौरान प्रिया के सम्पर्क में उसके बचपन का पड़ोसी आरिफ़ आया। प्रिया उसे बचपन से जानती ही थी। रोहन के साथ भी उसके सम्बन्धों को सामाजिक स्वीकृति मिलने की संभावना नहीं दिख रही थी। उनमें औपचारिकता का समवेश होता जा रहा था। ऐसी स्थिति में रोहन और प्रिया की प्रेम कहानी में एक पुराना पात्र नया रूप लेकर आरिफ नाम का प्रवेश हुआ। आरिफ एक आकर्षक और चतुर युवक था। वह प्रिया का पड़ोसी ही था और प्रिया उसे बचपन से जानती ही थी। वह जानती ही नहीं थी, वरन उसके प्रति आकर्षित भी थी। अलग-अलग धर्म होने के कारण पारिवारिक दूरियों के कारण वे अधिक निकट नहीं आ सके थे। आरिफ़ और प्रिया के चाहने पर भी वे अपनी पारिवारिक मजबूरियों के कारण अलग-अलग ही रहे थे। अब आरिफ़ भी परिपक्व हो चुका था और प्रिया भी सामाजिक संग्ठन के नाम पर स्वतन्त्रता का उपभोग कर रही थी। प्रिया समाज के एक स्थान बना चुकी थी व आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर थी। इन्हीं सब कारणों ने आरिफ़ को प्रभावित किया। आरिफ़ अभी भी आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहा था। यही वे कारण थे, जिनकी वजह से आरिफ़ ने प्रिया को अपने प्रेम जाल में फसाने की योजना बनाई।
प्रिया, जो रोहन से अपने रिश्ते में उलझी हुई थी, आरिफ के आकर्षण के आगे झुक गई। आरिफ ने प्रिया को बताया कि वह बचपन से ही उसे चाहता है, परिस्थितियों की मजबूरी के कारण वह उस समय इजहार नहीं कर पाया। आरिफ़ ने प्रिया से कहा, ’वह उसे सचमुच प्यार करता है और उसके लिए कुछ भी करेगा।’ प्रिया, जो रोहन के साथ अपने रिश्ते में खुश नहीं थी, आरिफ के शब्दों में खो गई।
आरिफ ने प्रिया को रोहन से दूर करने के लिए हर संभव प्रयास किए। उसने प्रिया को बताया कि रोहन केवल उसके पैसे और प्रतिष्ठा के लिए उसे प्यार करता है। प्रिया लम्बे समय तक आरिफ़ के इस तर्क को स्वीकार नहीं कर पाई। रोहन के पास पैसे की कमी नहीं थी। वह एक सफ़ल व्यवसायी था। प्रिया के एन.जी.ओ. में भी दान देता था। इस सबके बाबजूद धीरे-धीरे आरिफ़ प्रिया का ब्रेनवाश करने में सफ़ल रहा। प्रिया, जो पहले से ही रोहन के प्रति संदेह में थी, आरिफ की बातों में आ गई। वह रोहन से दूरी बनाते हुए आरिफ़ के निकट जाने लगी।
अब प्रिया और आरिफ के बीच एक गहरा संबंध बनने लगा। प्रिया ने रोहन आरिफ़ के साथ से अपने रिश्ते को छिपाना शुरू कर दिया और आरिफ के साथ समय बिताने लगी। रोहन, जो प्रिया से सच्चा प्यार करता था, को कुछ भी पता भी नहीं था। वह शंकालू स्वभाव का व्यक्ति नहीं था और न ही प्रिया से किसी प्रकार का स्वार्थ सिद्ध करना चाहता था। उसने प्रिया की निजता और आत्म-स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान करते हुए कभी भी अपना अधिकार जमाने की कोशिश नहीं की। उसने अपने प्रति प्रिया की उदासीनता अनुभव की तो स्वयं ही अपने आपको प्रिया से दूर कर लिया। वह प्रिया का सहयोग अवश्य करता था किन्तु अपनी तरफ़ से प्रिया से बात करने या मिलने में कोई रुचि नहीं दिखाता था। वह पुनः अपनी सफ़लता के पथ पर अग्रसर था।
आरिफ़ ने प्रिया को पूरी तरह से अपने चंगुल में फ़ंसा लिया था। धीरे-धीरे वह प्रिया पर अधिकार जमाने लगा था। वह विभिन्न प्रकार से पैसे भी ऐंठने लगा था। प्रिया को भी अजीब लगता, जब वह उससे पैसे की डिमाण्ड करता, किन्तु आरिफ़ इतना चतुर था कि प्रिया उससे इन्कार ही नहीं कर पाती थी। आरिफ़ से इन्कार न कर पाने के बाबजूद प्रिया सोचने लगी थी कि कहीं उसने रोहन से अलग होकर गलती तो नहीं कर दी है? प्रिया को भय भी लगने लगा था कि कहीं उसे अपने किए की सजा तो नहीं मिलेगी? कहीं वह लव जिहाद का शिकार तो नहीं हो गई है? दूसरे ही क्षण वह सोचने लगती, नहीं, नहीं! आरिफ़ ऐसा लड़का नहीं है। वह उसे बचपन से ही जानती है। वह उसे धोखा नहीं देगा। वह आरिफ के साथ खुश रहेगी।
आरिफ़ धीरे-धीरे प्रिया पर अपना सिकंजा कसता जा रहा था। वह उस पर धर्म परिवर्तन कर शादी का दबाव डालने लगा था। प्रिया आत्म-निर्भर, स्वतन्त्र विचारों की सामाजिक कार्यों में सक्रिय युवती थी। वह आरिफ़ से शादी करने को तो तैयार थी किन्तु धर्म परिवर्तन करने को तैयार नहीं थी।
एक दिन रोहन अपने कार्यालय से अपने आवास की तरफ़ जा रहा था कि तभी रोहन के मोबाइल पर प्रिया का काल आया,’ रोहन! मेरी जान खतरे में है। प्लीज मुझे बचा लो। रोहन ने लोकेशन पूछी और ड्राईवर को गाड़ी मोड़ने के लिए कहा। रोहन को गंभीर खतरे का आभास हो गया था, क्योंकि वह जानता था कि छोटे-मोटे खतरों से प्रिया घबड़ाने वाली लड़की नहीं है। उसने सेल्फ़ डिफ़ेंस के लिए ताइक्वांडो और करांटे की ट्रेनिंग कर रखी है। वह घबड़ा रही है, इसका मतलब खतरा गंभीर है। रोहन ने तुरंत अपने परिचित डीएसपी को फ़ोन करते हुए लोकेशन भेजी और त्वरित पुलिस सहायता के लिए अनुरोध किया।
रोहन शीघ्र ही प्रिया की बताई हुई लोकेशन पर पहुंच गया। वह एक सुनसान इलाका था। दूर-दूर तक एक ही बिल्डिंग दिखाई दे रही थी। रोहन और रोहन का ड्राईवर दोनों ही तुरन्त उस बिल्डिंग में मुख्य दरवाजे से दाखिल हुए। मुख्य दरवाजा तो खुला था किन्तु अन्दर जाने के लिए रास्ता नहीं था। दरवाजा अन्दर से बन्द था और दरवाजा तोड़ने के प्रयास की आवाज आ रहीं थीं। रोहन ने घंटी बजाई तो अन्दर कुछ देर के लिए आवाज बन्द हो गई। रोहित ने पुनः घण्टी बजाई तो अन्दर से धमकाने की आवाज आई, ’क्यों अपनी जान को खतरे में डाल रहा है? चुपचाप भाग जा। उसके बाबजूद रोहन ने दरवाजा खुलवाने पर जोर दिया तो रोहन के ऊपर फ़ायर कर दिया गया। गोली से रोहन घायल हो गया। उसी समय पुलिस टीम भी पहुंच चुकी थी। पुलिस ने रोहन को पीछे किया और स्वंय मोर्चा संभाल लिया। पुलिस कार्यवाही में आरिफ़ और उसके दो साथी पकड़े गए। प्रिया को अन्दर वाले कमरे से जिन्दा बरामद कर लिया गया। वह घायल रोहन से ही लिपट कर फ़ूट-फ़ूट कर रोने लगी। पुलिस ने उन दोनों को अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया।

डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, मुरादाबाद , में प्राचार्य के रूप में कार्यरत। दस पुस्तकें प्रकाशित। rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in मेरी ई-बुक चिंता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो शिक्षक बनें-जग गढ़ें(करियर केन्द्रित मार्गदर्शिका) आधुनिक संदर्भ में(निबन्ध संग्रह) पापा, मैं तुम्हारे पास आऊंगा प्रेरणा से पराजिता तक(कहानी संग्रह) सफ़लता का राज़ समय की एजेंसी दोहा सहस्रावली(1111 दोहे) बता देंगे जमाने को(काव्य संग्रह) मौत से जिजीविषा तक(काव्य संग्रह) समर्पण(काव्य संग्रह)