सामाजिक

क्यों बढ़ रहे हैं एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स

“राहुल प्लीज़ अभी मेसेज मत करो, यह पास ही सोए हुए हैं अगर देख लिया तो बेवजह कलेश हो जाएगा इनका गुस्सा तुम नहीं जानते ये गुस्से में कुछ भी कह और कर सकते है “ अनुष्का राहुल को अपनी मजबूरी बता रही थी।

“यार क्या है, दिन में भी तुम्हारे पास टाइम नहीं होता रात को तुम्हारे ये होते हैं तुम्हारे साथ, अगर रिश्ता नहीं रखना तो साफ़ साफ़ पीछे हट जाओ यार ये बहाने तो मत मारो” राहुल मेसेज सेंड करके ऑफलाइन हो गया।

अनुष्का का बहुत मन होता था राहुल के साथ बात करने का, उसके साथ टाइम स्पेंड करने का लेकिन दिन में ऑफिस, शाम को बच्चे और फिर पति की निगरानी के कारण वो विवश हो जाती थी। 

अनुष्का और राहुल ही नहीं, घर से बाहर आजकल अधिकतर लोगों के किसी ना किसी के साथ घनिष्ठ मित्रता पूर्वक संबंध होते हैं। इस घनिष्ठ मित्रता में अक्सर पुरुष हो अथवा स्त्री इतने अधिक भावुक हो जाते हैं कि वो अपने परिवार के सभी तनावों से दूर एक अलग ही दुनिया में जीना आरम्भ कर देते हैं। ऐसे संबंधों में, जहाँ दोनों, चाहे पुरुष हों या स्त्री, जिन्हें दिन में बस १० मिनट की वार्तालाप में ही इतना सुकून मिलने लगता है कि एक समय ऐसा भी आता है जब एक संडे बिताना भी इतना मुश्किल हो जाता है कि प्रतीक्षा रहती है कब मंडे आए और कब हमारा संपर्क स्थापित हो। यह संबंध इतने घनिष्ठ हो जाते हैं कि सामने आने पर इन्ही संबंधों को समाज एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर की संज्ञा दे देता है।

आखिर क्यों होते हैं एक्स्ट्रा मेरिट अफेयर

कहते हैं समय परिवर्तनशील है। प्रत्येक युग प्रत्येक काल में समाज के क्रियाकलाप, संस्कृति, विचारधारा और अभिव्यक्ति के माध्यम बदलते रहते हैं। मुझे याद है हमारे बचपन में जो समय हमने देखा है उसमे तलाक़ न के बराबर होते थे । लेकिन क्या हम यह मान सकते हैं कि तब सभी विवाहित जोड़े प्रसन्न थे अथवा उनमे परस्पर मतभेद नहीं होते थे। शायद नहीं। आज से ३ दशक पूर्व तक का समाज जो हमने देखा है उमे महिलायें घरेलू होती थीं। आर्थिक निर्भरता के कारण ९०% घरेलू हिंसा दिखायी नहीं देती थीं। लिहाजा इस आर्थिक निर्भरता के कारण महिलायें यथास्थिति स्वीकार कर अपना जीवन समर्पित कर देती थीं। किंतु आज औरतें किसी ना किसी व्यवसाय अथवा नौकरी में हैं। पुरुषों की मानसिकता आज भी वही है।घरेलू हिंसा आज भी उसी प्रकार आम है। अब परिस्थिति ने जो मोड़ लिया है उसमे महिलायें जब घर में तिरस्कृत होती हैं तो वो मस्तिष्क पर स्ट्रेस ना लेते हुए अपने मातिष्क का दूसरी तरफ़ झुकाव ले आती हैं। घर की प्रताड़ना से दूर अगर कोई पुरुष मित्र में उसे अपनापन लगता है तो वो क्षणिक मानसिक शांति के लिए उस संबंध में ख़ुद को उलझाने में नहीं हिचकतीं। सही भी है। आख़िर इंसान ही तो है। अगर माइंड डाइवर्ट ना किया जाये तो एक छत के नीचे अपने कर्तव्यों की पूर्ति करते करते बहुत सी महिलायें डिप्रेशन का भी शिकार हो जाती हैं।

पुरुषों को भी आवश्यकता है एक्स्ट्रा मेरिटल रिलेशन की?

ऐसी बात नहीं कि घरेलू तनाव का शिकार केवल महिलायें ही होती हैं।कई घरों में महिलाओं का व्यवहार भी ऐसा होता है कि पुरुषों का भी एक बहुत बड़ा वर्ग मानसिक तनाव से ग्रस्त हो सकता है। कचहरियों में दहेज के झूठे मामले इस बात के पुख्ता प्रमाण देते हैं। लिहाजा जब घर की दहलीज़ से बाहर, चाहे पुरुष हो अथवा स्त्री, उसे लगता है कि कोई है जो उसके मन को समझता है, ख़ुद को समर्पित करने में गुरेज़ नहीं करते।

एक बहुत ही मजे की बात। अगर हम आस पास लोगों का सर्वे करें तो पायेंगे लगभग लगहग हर दूसरा व्यक्ति किसी ना किसी विपरीत लिंगी के साथ घनिष्ठ संबंधों में सम्मिलित है। लेकिन अगर आप खुल कर एक्स्ट्रा मैरिटल मित्रता पर अगर लोगों से वार्ता करें तो पाएंगे ९९% समाज इसके विरुद्ध होगा। अब देखिए फिर भी जब हर दूसरा व्यक्ति किसी ना किसी संबंध में लिप्त है, तो यह दोगली विचारधारा क्या एक ढोंग नहीं?

आख़िर एक्ट्रा मैरिटल अफेयर का क्या है अंत?

इस बात में कोई संदेह नहीं की हमारे समाज में एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स अब आम हैं। छिपकर ही सही लेकिन लोग अपने आप को बजाए किसी डिप्रेशन का शिकार होने दें, उन्हें किसी मित्र के साथ समय बिताना पसंद आता है जो उनके मन को समझे भी और उनके मन में उतरे भी। विशेषतया जो लोग तलाक़ जैसे कठिन निर्णय लेने में अक्षम हैं वो घर गृहस्थी जिनमेदारी के साथ निभाते हुए कुछ क्षण अपने घनिष्ठ मित्र के साथ बीतते हुए स्वयं को एक नई ऊर्जा देकर नयी ज़िंदगी की और अग्रसर होते हैं।

यद्यपि ऐसी बात नहीं कि ऐसे घनिष्ठ मित्रता में शारीरिक संबंध नहीं बनते, किंतु यह निर्णय दोनों की आपसी पसंद पर निर्भर करता है। बाक़ी जहाँ तक मेरा अनुभव है, स्त्री मित्रता में शारीरिक संबंधों से दूरी बनाना पदंड करती है, जब तक की उसकी अपनी आवश्यकता ना हो। क्यूंकि कई बार ऐसा भी होता है जब स्त्री अपने घर में मार पिटाई का शिकार होती है तो वो बाहरी मित्रता में शारीरिक सबंध बनाने में ज़्यादा विचार नहीं करती। 

यदि समाज में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स को कुछ अधिक ही गंभीरता से लिया जाने लगे तो फिर हमे इस पर भी विचार जरूर करना होगा कि इस तरह के संबंध तभी बनते हैं जब घर के अंदर पति और पत्नी एक दूसरे का सम्मान नहीं करते। यह ह्यूमन साइकोलॉजी है कि जब अपना पार्टनर तिरस्कार करता रहे तो व्यक्ति, चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष, दूसरे के साथ संबंध बनाने से नहीं चूकेगा।

— महेश कुमार माटा

महेश कुमार माटा

नाम: महेश कुमार माटा निवास : RZ 48 SOUTH EXT PART 3, UTTAM NAGAR WEST, NEW DELHI 110059 कार्यालय:- Delhi District Court, Posted as "Judicial Assistant". मोबाइल: 09711782028 इ मेल :- mk123mk1234@gmail.com