तनहा तो इतने थे
चाँद भी चुप था,
रात की नमी में डूबी—
यादें बेआवाज़।
पेड़ की शाखों पर,
साँसों का सन्नाटा था,
हवा भी बोली नहीं।
कदमों की धुन—
अपने ही साए से बातें,
रास्ता सुनता रहा।
दूर कहीं दीप,
बुझने से पहले तक—
उम्मीद चमकी थी।
मन की झील में,
पत्थर गिरा खामोशी से,
लहरें लौट आईं।
भीड़ में गुम,
चेहरे सब अपने से दूर,
सन्नाटा साथी।
वक्त की धूल,
दिल पर जमी थी हल्की—
तन्हाई बोली।
फिर भी कहीं,
सूरज की किरन उतरी,
जीवन मुस्काया।
— डॉ. अशोक
