मुझे क्या
मतलब और बेमतलब
के बीच फंसा है मुझे क्या
किसी के घर किलकारी गूंजी
मुझे क्या
कोई बिमारी की वजह से बर्बाद
कोई ऐयासी के कारण कंगाल
कोई दानवीर बन वाह-वाही बटोरे
मुझे क्या
विकास के नाम पर हरियाली लुप्त
नयी शिक्षा पद्धति में फटकार लुप्त
कुर्सी के नीचे से बाबू तृप्त
मुझे क्या
दहेज का दूसरा पहलू कंगाल बनाये
बेटियां अब अक्सर तलाक ले इतराये
दहेज कानून में लिपट युवक
फांसी लगाये मुझे क्या
अब हजारों नहीं बल्कि लाखों में एक
सर्वेभवन्तु सुखिन: गाये
मुझे क्या
क्यों नहीं संवेदनाएं दिल पर दस्तक देती
क्यों नहीं पड़ोसी के सुख-दुख
हमारी चेतना जगाये ऐसे सवाल भी
कभी कभी रातों के नींद और
दिन का चैन उड़ा ले जाये ।
— आरती रॉय
