अमृतपर्व का अमृतकलश : अज्ञात बलिदानियों की शौर्यगाथा
तन समर्पित मन समर्पित और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं I
(रामावतार त्यागी)
भारत की पुण्य भूमि में जन्म लेना मनुष्य का परम सौभाग्य माना जाता है I देवताओं, ऋषियों और मुनियों ने इस पावन भूमि की प्रशंसा की है I भारत भूमि का एक टुकड़ा मात्र नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा है, वसुधैव कुटुम्बकम का उद्घोष है, ऋग्वेद की ऋचाएं हैं, गौतम बुद्ध का शांति संदेश है, भगवान श्रीकृष्ण की गीता का निष्काम कर्मयोग है, गुरु नानक की वाणी है, सरस्वती की वीणा है और भगवान शंकर का डमरू है I विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचाएं भी इस पावन भूमि की प्रशंसा करती हैं I मानव जीवन तो क्षणभंगुर है, लेकिन भारत सदियों से प्रकाशस्तंभ बनकर विश्व का मार्गदर्शन कर रहा है I परतंत्र भारत की स्वतंत्रता के लिए असंख्य वीरों ने अपनी आहुति दी है, लेकिन उनमें से अनेक अज्ञात रह गए I उन हजारों हुतात्माओं में से हम कुछ लोगों के ही नाम जानते हैं I हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के सर्वस्व न्योछावर करने के उपरांत हमें मुक्त आसमान नसीब हुआ I ऐसे असंख्य स्वतंत्रता सेनानी अज्ञात रह गए जिन्होंने अपने रक्त से क्रांति की मशाल जलायी थी I स्वतंत्रता के महायज्ञ में अपनी आहुति देनेवाले सेनानियों ने अपने रक्त से भारतवासियों के भविष्य की महागाथा लिखी है I स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अवसर पर हिंदी के प्रसिद्ध लेखक डॉ रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ ने अपनी पुस्तक ‘अमृतपर्व का अमृतकलश’ में स्वतंत्रता की बलिवेदी पर आत्मोत्सर्ग करनेवाले अथवा आजीवन संघर्ष करनेवाले 75 अज्ञात और अल्पज्ञात बलिदानियों की संघर्ष गाथा को रेखांकित किया है I डॉ यायावर की यह कृति अज्ञात और अल्पज्ञात बलिदानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है I लेखक ने पुस्तक की भूमिका ‘कलम आज उनकी जय बोल’ में लिखा है-‘’अपने इस ‘अमृतपर्व का अमृतकलश’ में मैंने कुछ अनगाये तथा कम सुने, कम कहे और कम गाये वीरों/वीरांगनाओं और बलिदानियों की ज्वलंत गाथाओं की 75 अमृत-बूंदें सहेजी हैं I वे जिन्होंने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए, वे जिनके लिए जीवन एक खेल था और मृत्यु एक तमाशा, वे जो सत्ता की मदांधता की आँखों में सुई नहीं बर्छी चुभा सके, वे जिनके त्याग और बलिदान ने हमें आज इस योग्य बनाया है कि हम स्वतंत्र होकर उनका कीर्ति-गायन कर सकें, वे जो जीवित नर-नाहर थे, वे जो अपने प्राणों का बलिदान देकर मृत्यु को गौरवान्वित कर गए, वे जिनके लिए धरती पर सत्ता ने हथकड़ी, बेड़ी, डंडा-बेड़ी, बेंत, अमानवीय यातनाएं, अकथनीय अत्याचार, लाठी और गोली के उपहार सजाकर रखे थे, परंतु स्वर्ग के नतग्रीव देवताओं ने जिनके सम्मान में पारिजात के पुष्प पंथ पर बिखराकर जिन्हें धन्य किया और वे जो भारत माता का मस्तक गर्व से ऊँचा कर गए I”
‘अमृतपर्व का अमृतकलश’ पुस्तक चार खंडों में विभक्त है-(क)अतीत के वातायन से (ख)1857 के नर-नाहर (ग)चरम संघर्ष काल के बलिदानी और (घ)फिरोजाबाद के संकल्पधनी योद्धा I प्रथम खंड में उन दस बलिदानियों के शौर्य और आत्मबलिदान का जीवंत विवेचन किया गया है जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व आज़ादी का शंखनाद किया था I इस खंड में अपराजेय कलंगा दुर्ग, कवि गंग, पालीताणा के हुतात्मा, रानी बेलु नचियार, करनसिंह माड़ापुरिया, गुंडाधुर, सुरेन्द्र साए, टंटया भील, नूनू प्रसाद सिंह शामिल हैं I रानी बेलु नचियार ने दक्षिण भारत में तमिलनाडु की शिवगंगा रियासत में प्रथम विद्रोह का बिगुल बजाया था I 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी पहले इस वीरांगना ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी I छत्तीसगढ़ के बस्तर के एक वनवासी वीरवर गुंडाधुर ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेज सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया और अपनी जान दे दी I टंटया भील ने अंग्रेजों के विरुद्ध आज़ादी की शंख ध्वनि की थी जिसके लिए उन्हें 4 दिसंबर 1889 को फाँसी दे दी गई I वे आज भारतवासियों के जननायक हैं I
पुस्तक के दूसरे खंड ’1857 के नर-नाहर’ में 23 स्वतंत्रता सेनानियों की अमर गाथा प्रस्तुत की गई है जिन्होंने अपने पराक्रम से आजादी की लौ प्रज्वलित की थी I राजा अमर सिंह, उदमीराम, भास्करराव बाबा साहब नरगुंदकर, देवहंस गुर्जर, कैप्टन हीरा सिंह, लियाकत अली खां, नवाब निजाम अली, टिकेंद्र्जीत सिंह, गोपाल पाण्डेय, वीरांगना अजीजनबाई, राजा नाहर सिंह, राव कदमसिंह गुर्जर जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने परतंत्रता की बेड़ियों को काटने के लिए अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया था I प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक बाबू कुँवर सिंह का नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन उनके अनुज राजा अमर सिंह का नाम अल्पज्ञात है I बाबू कुँवर सिंह की मृत्यु के उपरांत उनके अनुज राजा अमर सिंह ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए I उन्होंने न समर्पण किया, न परास्त हुए I भास्करराव बाबा साहब नरगुंदकर के बलिदान को कौन भूल सकता है जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देते हुए अंग्रेज अधिकारी मेंशन का सिर धड़ से अलग कर दिया था I इस अपराध के लिए अंग्रेजों ने उन्हें फाँसी की सजा दे दी थी I भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बीर टिकेन्द्रजीत सिंह का योगदान स्वर्णाक्षरों में अंकित है I मणिपुर के इस वीर योद्धा ने अंग्रेजों के विरुद्ध जिस साहस और पराक्रम का परिचय दिया वह वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरक है I उनका जन्म 29 दिसंबर 1856 को हुआ था I टिकेन्द्रजीत सिंह महाराजा चन्द्रप्रकाश सिंह और चोंगथम चानु कूमेश्वरी देवी के पुत्र थे I वे स्वतंत्र मणिपुर रियासत के राजकुमार थे I टिकेन्द्रजीत सिंह एक महान देशभक्त और ब्रिटिश साम्राज्य के प्रबल विरोधी थे I उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जन सामान्य में चेतना का संचार किया तथा अदम्य साहस और निर्भीकता के साथ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व किया I इसलिए उन्हें मणिपुर का शेर कहा जाता है I अंग्रेज उनसे भयाक्रांत रहते थे I इसलिए अंग्रेज उन्हें खतरनाक बाघ कहकर संबोधित करते थे I जनता के प्रबल विरोध के बावजूद 13 अगस्त 1891 को टिकेन्द्रजीत सिंह को आम जनता के सामने सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई I स्वतंत्रता के महायज्ञ में कैप्टेन हीरा सिंह का भी महत्वपूर्ण योगदान है I स्वतंत्रता के महासमर में छोटी-बड़ी रियासतों के जमींदार और सामान्य लोगों ने भी बलिदान दिया था I अमर शहीद अहमद यार खां का बलिदान उनके साहस और देशभक्ति का साक्षी है I 1857 के भामाशाह जगतसेठ रामजीदास गुड़वाला का त्याग और बलिदान हर भारतीय को गर्व से भर देता है I
पुस्तक के तृतीय खंड ‘चरम संघर्ष काल के बलिदानी’ में 37 स्वतंत्रता सेनानियों की वीरगाथा प्रस्तुत की गई है I इस खंड में 1857 से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक के योद्धाओं के राष्ट्रप्रेम, बलिदान, जोश, पराक्रम और रण कौशल की विवेचना की गई है I भाई बालमुकुंद, अल्लूरी सीताराम राजू, दिनेश गुप्त, बाबा पृथ्वी सिंह ‘आज़ाद’, काशीराम, बैकुंठनाथ शुक्ल, वासुदेव बलवंत फड़के, खान बहादुर खान, चम्पकरमण पिल्लई, अवनीनाथ मुकर्जी, ऋषिकेश लट्ठा, रानी गाइदिन्ल्यू, जदोनंग, महेंद्र गोप, पं.परमानन्द, रोहिणी बरुआ, बच्चू लाल भट्ट, बाबा रामप्रसाद पुजारी जैसे सेनानियों ने स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ की लौ को मंद नहीं होने दिया I अंग्रेजी सरकार विद्रोह को कुचलने एवं स्वतंत्रता सेनानियों को फाँसी देने के लिए न्याय का नाटक करती थी I भाई बालमुकुन्द को भी अंग्रेजों ने फाँसी दे दी I अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों पर निरंतर अन्याय और अत्याचार किया जाता था, उन्हें यातनाएं दी जाती थीं, तरह-तरह से उनका उत्पीड़न किया जाता था, लेकिन भारत माता के वीर सपूतों का जोश ठंढा नहीं हुआ I अंग्रेज चुन-चुनकर स्वतंत्रता सेनानियों को मार रहे थे या फाँसी दे रहे थे I उन्होंने आंध्रप्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू को पेड़ से बांधकर गोलियों से भून डाला, लेकिन आज़ादी के मतवाले का मनोबल तोड़ने में वे नाकाम रहे I स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बैकुंठनाथ शुक्ल, निष्काम कर्मयोगी काशीराम, बाबा पृथ्वी सिंह ‘आज़ाद’, दिनेश गुप्त, वासुदेव बलवंत फड़के, चम्पकरमण पिल्लई जैसे सेनानियों के नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है जिन्होंने अपनी सूझबूझ और पराक्रम से भारत को परतंत्रता से मुक्त कराने में उल्लेखनीय भूमिका निभायी I मणिपुर के जनजातीय समाज में भी स्वतंत्रता की दीपशिखा जल रही थी I रानी गाइदिन्ल्यू ने विभिन्न नागा कबीलों को एकजुट किया और अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाकर लड़ाई को तेज कर दिया I ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित धर्म परिवर्तन के विरुद्ध भी उन्होंने आवाज बुलंद की I उनके तेजस्वी व्यक्तित्व और ओजस्वी भाषण के कारण अनेक आदिवासी उन्हें देवी का अवतार समझते थे और देवी की तरह उनकी पूजा करते थे I रानी की प्रेरणा से भारी संख्या में लोग स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो रहे थे I वर्ष 1932 में असम राइफल्स की एक टुकड़ी रानी और उनके साथियों को पकड़ने के लिए भेजी गई I अंग्रेजों ने रानी और अन्य आंदोलनकारियों को जीवित या मृत पकड़ने का आदेश दिया था I आंदोलनकारियों और अंग्रेज सेना के बीच कई बार मुठभेड़ भी हुई I रानी गाइदिन्ल्यू को पकड़ना आसान नहीं था I वे अपना नाम और वेशभूषा बदल-बदलकर घूम रही थीं, साथ-साथ वे नागा समुदाय के युवकों को अपने दल में शामिल भी कर रही थीं I उन्हें पकड़ने के लिए चालाक अंग्रेज अधिकारियों ने पुरस्कार की भी घोषणा कर दी I उन्हें 17 अप्रैल 1932 को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया I देश स्वतंत्र होने पर उन्हें कारागार से मुक्त किया गया I मणिपुर के स्वतंत्रता सेनानी जादोनंग कुशल संगठनकर्ता और अद्भुत योद्धा थे I उन्हें 29 अगस्त 1931 को फाँसी पर चढ़ा दिया गया I
कनाडा प्रवास के दौरान पंजाब के डॉ मथुरा सिंह ग़दर पार्टी के संपर्क में आए I एक अंग्रेज जासूस उनका पीछा कर रहा था और उन्हें जनवरी 1970 में गिरफ्तार कर लाहौर जेल भेज दिया गया I उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और 27 मार्च 1917 को उन्हें फाँसी दे दी गई I भारतवासियों के ह्रदय में स्वतंत्रता की आग जल रही थी I सम्पूर्ण देश गुलामी से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था I ट्यूटीकोरीन नगर के प्रसिद्ध वकील चिदंबरम पिल्लै अपने ओजस्वी भाषण से जनता में जोश का संचार कर रहे थे तो बंगाल में वीरेंद्रनाथ दत्ता अपने फौलादी संकल्प से अंग्रेजों को चुनौती दे रहे थे I न्याय का नाटक करते हुए अंग्रेजों ने 21 फ़रवरी 1910 को वीरेन्द्र नाथ दत्त को फाँसी दे दी I औरैया के क्रांतिवीर मुकुन्दीलाल गुप्त को काकोरी केस में कालापानी की सजा दी गई और बिहार के क्रांतिवीर महेंद्र गोप को 13 सितम्बर 1945 को फाँसी दे दी गई I अपराजेय पौरुष के धनी पं.परमानंद, कवि-क्रांतिकारी पंडित जगतराम भारद्वाज, मणीन्द्रनाथ बनर्जी, रमेश गुप्त, रोहिणी बरुआ, रोशनलाल मेहरा, दादा शंभूनाथ ‘आज़ाद’ बच्चू लाल भट्ट, इन्द्रसिंह गढ़वाली, कृष्णा काकादे, श्रीमती मातांगिनी हाजरा और लोकगायक बाबा रामप्रसाद पुजारी जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के शौर्य, देशभक्ति और बलिदान पर देश को गर्व है I
पुस्तक के चतुर्थ खंड ‘फीरोजाबाद के संकल्पधनी योद्धा’ में लेखक ने अपने जनपद फीरोजाबाद के अल्पचर्चित क्रांतिकारियों की शौर्यगाथा का वर्णन किया है I फीरोजाबाद जनपद के भगवतीचरण बोहरा महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे I इसी जनपद के हरीशंकर शर्मा ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दे दिया I इस जनपद के मेवाराम प्रचंड साहस वाले तेजस्वी युवा थे जो आज़ादी का सपना देखते हुए 15 मई 1933 को जेल में ही शहीद हो गए I फीरोजाबाद के रामचंद्र पालीवाल भारत के जाज्वल्यमान नक्षत्र थे जिनको पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार ने दस हजार रुपए का इनाम घोषित किया था I भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में उनका उल्लेखनीय योगदान था I लोकगायक पं.गयाप्रसाद शर्मा स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी योद्धा थे I वे अपने भजनों के माध्यम से जनजागरण कर आजादी की अलख जगा रहे थे I ‘अमृतपर्व का अमृतकलश’ पुस्तक स्वातंत्र्य समर के उन अज्ञात-अख्यात वीर सपूतों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया I इस अनमोल कृति के लेखक डॉ रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ साधुवाद के अधिकारी हैं जिन्होंने परिश्रमपूर्वक खोज-खोजकर इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की गौरव गाथा का दस्तावेजीकरण किया है I इतिहास में रुचि रखनेवाले अध्येताओं, शोधार्थियों और आम पाठकों के लिए यह पुस्तक उपादेय है I
पुस्तक-अमृतपर्व का अमृतकलश
लेखक-डॉ रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’
प्रकाशक-निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा
वर्ष-2023
पृष्ठ-192
मूल्य-800/-
