मैं जिंदा हूं
धूप की रेखा
टूटी दीवारों पर
अब भी चमकती
साँसों की लय
शून्य में भी सुनाई
धीमी पर दृढ़
सूखे पत्ते
पांवों तले कहते
चलते रहो तुम
रात की स्याही
आंखों में उतरकर
भोर रचती
आंधी के बाद
टहनी पर ठहरा
एक हरापन
चुप आकाश
भीतर की आवाज़
जाग उठी है
राख तले भी
दबी चिंगारी सी
मैं जिंदा हूं
— डॉ. अशोक
