सामाजिक

भारत में कुपोषण : विकास के बीच विद्यमान एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट

आज भारत वैश्विक मंच पर मजबूत अर्थव्यवस्था, तकनीकी प्रगति और मानव संसाधन क्षमता के लिए सम्मानित होता है। लेकिन इसी राष्ट्र में एक “मौन संकट” लगातार गहराता जा रहा है — कुपोषण, विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं के बीच। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास का संयुक्त प्रश्न है।

सबसे ताज़ा सरकारी आंकड़े हमें बताते हैं कि भारत में बच्चों की पोषण स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। पुरुष एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संसद में साझा किए गए Poshan Tracker के डेटा के अनुसार, लगभग 17 प्रतिशत पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चे “अंडरवेट” यानी आयु के हिसाब से कम वजन वाले हैं, जबकि लगभग 36 प्रतिशत बच्चे “स्टंटेड” अर्थात् उनकी लंबाई आयु के अनुरूप नहीं हो पा रही है, और लगभग 6 प्रतिशत बच्चे “वेस्टेड” यानी हाइट के अनुपात में अत्यधिक दुबले हैं। ये तीनों संकेतक मिलकर दर्शाते हैं कि बच्चों में क्रॉनिक और तीव्र दोनों तरह की कुपोषण स्थितियाँ मौजूद हैं।

लंबे समय से चल रहे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार भी यह स्थिति समान्य से अधिक गंभीर है। इसके मुताबिक पाँच वर्ष से कम उम्र के 35.5 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड हैं, 19.3 प्रतिशत बच्चे वेस्टेड हैं और 32.1 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं। यह संकेतक यह स्पष्ट करते हैं कि देश में बच्चों के शरीर और मस्तिष्क का विकास पर्याप्त पोषक तत्वों के अभाव की वजह से बाधित हो रहा है, जिससे उनका दीर्घकालिक स्वास्थ्य, शिक्षा में सीखने की क्षमता और जीवन कौशल प्रभावित होता है। संयुक्त राष्ट्र की State of Food Security and Nutrition in the World 2025 (SOFI) रिपोर्ट भी भारतीय परिदृश्य की गंभीरता को रेखांकित करती है। रिपोर्ट के अनुसार 2024 तक भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के लगभग 18.7 प्रतिशत बच्चे वेस्टेड स्थितियों से प्रभावित पाए गए हैं, जो विश्व में सबसे अधिक दरों में से एक है। इसमें लगभग 37.4 मिलियन (3.74 करोड़) बच्चे स्टंटेड भी हैं, जो यह दर्शाता है कि भारत में पोषण की गुणवत्ता और संतुलन की कमी गंभीर है।

कुपोषण केवल बच्चे तक सीमित नहीं है। महिलाओं में पोषण स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। SOFI 2025 रिपोर्ट के अनुसार 15-49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में एनीमिया (लोहअभाव) बहुत व्यापक है, जिसके परिणामस्वरूप 203 मिलियन से अधिक महिलाएँ इससे प्रभावित पाई गईं—भारत ने एशिया में सबसे उच्च दरें दर्ज की हैं। कुपोषण का सीधा प्रभाव केवल शारीरिक कमजोरी पर नहीं होता, बल्कि मानसिक और संज्ञानात्मक विकास पर भी पड़ता है। अध्ययनों से पता चलता है कि जीवन के पहले 1000 दिनों (गर्भाशय में जीवन से लेकर दो वर्ष की आयु तक) में पोषण की कमी मस्तिष्क के विकास को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकती है। यह बच्चों की सीखने की क्षमता, स्कूल में प्रदर्शन और भविष्य की उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है।

कुपोषण के कारण बहुआयामी हैं। गरीबी अभी भी एक बड़ा कारक है, क्योंकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि लगभग 42.9 प्रतिशत भारतीय आबादी एक स्वस्थ आहार वहन करने में असमर्थ है। इसका अर्थ यह है कि लगभग आधी आबादी के पास पोषक तत्वों से भरपूर भोजन तक नियमित पहुँच नहीं है — यह केवल कुपोषण की समस्या नहीं है, बल्कि खाद्य असुरक्षा का पैमाना भी है। सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ कुपोषण को बढ़ाती हैं। कुछ राज्यों में संकेतक कहीं अधिक गंभीर हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बच्चों की स्टंटिंग दर राष्ट्रीय औसत से भी अधिक पाई जाती है, जो गरीबी, शिक्षा की कमी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच के परिणाम हैं।

हालाँकि कुछ सकारात्मक संकेत भी मौजूद हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कुपोषण से निपटने के लिए POSHAN Abhiyaan (राष्ट्रीय पोषण अभियान) जैसे व्यापक कार्यक्रम लागू किए हैं, जिसका लक्ष्य बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं तक पोषण सेवाओं का उचित वितरण सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही मिड-डे मील योजना और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसी पहलों से पोषण में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं। राज्यों में स्थानीय स्तर पर भी प्रयास हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में “मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0” के अंतर्गत 1.43 करोड़ से अधिक बच्चों की पोषण मैपिंग की गई है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि लक्षित बच्चों तक पोषण सेवाएँ पहुँच रही हैं। राज्य में 93.65 लाख गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की गई हैं, और आंगनवाड़ी केंद्रों के आधुनिकीकरण के प्रयास भी जारी हैं।

इसी प्रकार कुछ स्थानीय अभियानों ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। नोएडा में “संभाव अभियान” के तहत गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों में स्वास्थ्य में करीब 40 प्रतिशत सुधार देखा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि नियमित निगरानी, स्थानीय स्तर पर समर्थन और आंगनवाड़ी सेवाओं की सक्रिय भागीदारी कुपोषण के खिलाफ प्रभावी हथियार हो सकते हैं। फिर भी यह स्पष्ट है कि केवल कार्यक्रमों का होना ही पर्याप्त नहीं है। पोषण समस्या का समाधान अभ्यास, जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए, पोषण विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि आंगनवाड़ी और मिड-डे मील सहित अन्य पोषण कार्यक्रमों में सोया आधारित पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल किया जाए, क्योंकि सोया प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होता है और यह सस्ता भी है। इससे बच्चों और वंचित परिवारों को संतुलित आहार उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

कुपोषण की समस्या केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि विकास नीति, सामाजिक न्याय और मानव पूंजी निर्माण का भी विषय है। पोषण की कमी से ग्रस्त बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, जिससे वे संक्रमण से अधिक प्रभावित होते हैं और स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित करता है क्योंकि कमजोर पोषण वाले बच्चे भविष्य में कम उत्पादक हो सकते हैं। भारत को कुपोषण के प्रभावी समाधान के लिए कई स्तरों पर रणनीति अपनानी होगी। आवश्यक है कि पोषण को लोक स्वास्थ्य और शिक्षा नीतियों के केंद्र में रखा जाए. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनवाड़ी केंद्रों और स्कूलों को पोषण सेवाओं के नये मॉडलों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, ताकि संतुलित आहार, पोषण शिक्षा और व्यवहार परिवर्तन की प्रक्रिया सभी तक पहुँच सके।

भोजन की उपलब्धता मात्र समाधान नहीं है; भोजन की गुणवत्ता और पोषक विविधता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि कोई परिवार केवल अनाज तक सीमित रहता है, लेकिन प्रोटीन, फल, सब्जियाँ और दुग्ध उत्पादों की कमी बनी रहती है, तो बच्चे और महिलाएँ पोषण संबं्धित कमजोरियों से मुक्त नहीं हो पाएंगी। इसलिए पोषण संवितरण योजनाओं को खाद्य विविधता के साथ जोड़ा जाना चाहिए। भारत जैसे विशाल और विविध देश में कुपोषण की चुनौती राष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ योजना, स्थानीय स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन, और सामाजिक स्तर पर जागरूकता से ही हल हो सकती है। यह समस्या केवल स्वास्थ्य विभाग की नहीं है; यह सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, कृषि और सार्वजनिक वितरण प्रणालियों का संयुक्त प्रश्न है।

यदि आज हम कुपोषण को प्राथमिकता दिए बिना आगे बढ़ते हैं, तो यह समस्या आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और उत्पादन क्षमता पर दीर्घकालिक प्रभाव डालेगी। कुपोषण का सामना करना केवल मानवीय दायित्व नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय विकास की रणनीतिक आवश्यकता भी है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम कुपोषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानते हुए, उसको नीति, कार्यक्रम और समुदाय स्तर पर प्राथमिकता दें। तभी एक स्वस्थ, सशक्त और समृद्ध भारत का सपना वास्तविकता में बदल सकता है।

— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330