ढूंढ रहा हूं
ढूंढ रहा हूं
खुद को खुद में
कतरा -कतरा जी रहा हूं
खुद को खुद में ।
उम्मीदों के सहारे
आगे बढ़ा रहा हूं
खुद को खुद में
भीतर- बाहर ढूंढ रहा हूं
खुद को खुद में ।
तिनका- तिनका हुई जिंदगी
दर्पण सा देख रहा हूं
खुद को खुद में
कुछ कहने की
कुछ सुनने की चाहत बाकी है
खुद को खुद में ।
अंत नहीं में
आशा भरा जीवन हूं
खुद को खुद में ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
