व्यंग्य – होली के रंग में सराबोर रचना
दीवाली पर जैसी व्यापारी की तैयारी होती है वैसी ही होली पर व्यंग्यकार की तैयारी होती है। होली व्यंग्य वालों का सीज़न है। जैसे दीवाली के बाज़ार में जाम पड़ा स्टाक भी क्लीयर हो जाता है वैसे ही होली पर कहीं न छपी रचनाये भी प्रकाशित हो सकती है बशर्ते व्यंग्यकार व्यापारी की तकनीक अपना ले। व्यापारी जैसे पुराने सामान की नई पेकिंग करता है वैसे ही लेखक को अप्रकाशित रचनाओं के शीर्षक बदलने होगे। होली की रचनाओं में महत्वपूर्ण शीर्षक होता है। पूरी रचनाओं में होली का ज़िक्र न हो तो भी चलेगा लेकिन शीर्षक में होली शब्द का होना ज़रूरी है क्योकि होली अंक के लिये संपादक उसी रचना का चयन करते है जिनके शीर्षक में होली हो। पाठक भी तो अब सिर्फ़ शीर्षक ही तो पढ़ते है पूरी रचना पढ़ने का तो अब चलन ही नहीं रहा।
होली पर नई रचना उसी की मानी जाती है जो लेखक नया शीर्षक रचे। बुरा न मानो होली है, फिर देख बहारे होली की, होली के रंग फलां फलां के संग इन पारंपरिक शीर्षक से जिसने रचना को बचा लिया उसी की रचना पार लगेगी बाकी होली के रंगीन पानी में डूब जायेगी।
जो कलेंडर के अनुसार लेखन करते है वे सभी नये वर्ष और वेलेंटाईन डे पर लिखने के बाद होली की तैयारी शुरू कर देते है। वेलेंटाईन डे के बाद तीन प्रकार की तैयारी होती है – छात्र द्धारा परीक्षा की, लेखक द्धारा होली अंक की और व्यापारी द्धारा एकाउंट क्लोसिंग की तैयारी है। ये तीनो तैयारी वेलेंटाइन डे के बाद शुरू होती है और वेलेंटाइन डे की तैयारी ही ऐसी तैयारी है जिसकी तैयारी इसे मनाने वाले साल भर करते है।
वही लेखक होली पर होलियाना रचना लिख पाते है जो लिखने के लिये कमर कस कर तैयार हो जाते है। कमर कसने में कसना कुछ नहीं होता बस ऐसा कहा जाता है जैसे कश्मीरी पुलाव में कश्मीर नहीं होता। पुलाव में कश्मीर न हो तो ठीक है लेकिन उस पुलाव में तो पुलाव भी नहीं होता है। इसी प्रकार व्यंग्य रचनाओं में भी कई बार सब कुछ होता है बस व्यंग्य नहीं होता। पिछली होली पर एक व्यंग्यकार जी मिले थे और उन्होंने मेरे को चुनौती दे दी कि मेरी व्यंग्य रचनाओं में व्यंग्य ढूंढ कर बताओ तो जानू और मैं हार गया।
होली पर हास्य व्यंग्य लिखने का चलन है। अगर होली जैसा रंगीला पर्व नहीं होता तो हम सैकड़ो रंग बिरंगी रचनाओं से वंचित हो जाते। होली पर कैसे न लिखे होली तो अभिव्यक्ति का सब से सशक्त माध्यम है। जितने भी लिखने वालें है उन्होंने होली पर ज़रूर लिखा है, जिन्होंने नहीं लिखा उनका समस्त लेखन संदिग्ध माना जाना चाहिये क्योकि होली की मस्ती, होली का खुलापन, होली के रंग मन की अभिव्यक्ति के लिये पुकारते है। ध्यान रहे यह हिंदी भाषा की होली है जिसमे अंग्रेज़ी भाषा वाला होली समाहित है।
होली पर लिखने में होली शब्द सही लिखना ज़रूरी है यदि जल्दबाज़ी में मात्रा इधर की उधर हो गई तो नये नये अर्थ वाले शब्द बन जाते है जैसे मधुशाला का हाला, शायर हाली, किसान का हल, गटर का होल, फ़ोन वाला हैलो, जूते की हील, वर्तमान वाला हाल, शोर वाला हल्ला।
मेरे एक लेखक मित्र होली साहित्य के विशेषज्ञ है। उनका कहना है कि अपने आलेख में व्याप्त खराबियों को जमा करो और एक व्यंग्य रचना लिखो जैसे हमेशा लिखते हो। अब इस रचना को होली के अवसर पर इस्तेमाल करना है तो उसमें रंग, गुलाल, गाल, चुनरी, चोली, भांग, फाग, पिचकारी इन शब्दों को उसमें मिक्स कर दो। अब लिखो कि नेता और अफ़सर पर कोई रंग नहीं चढ़ता, इनका रंग पल पल बदलता है। इसके बाद पानी बचाओ और सूखे रंग से होली खेलने का उपदेश दो। साबित करो कि होली खेलने के लिये दीवाना होना ज़रूरी है अगर होली के दिन पिचकारी पर प्रतिबंध लगा दिया जायेगा तो दीवाना आंख में पानी भर कर ले आयेगा। और अंत में नज़ीर साहब की इन पंक्तियों से रचना का समापन करो –
जब फागुन रंग झमकते हो तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हो तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हो तब देख बहारें होली की
ख़ुम, शीशे, जाम, झलकते हो तब देख बहारें होली की
— अखतर अली
