बाल कविता – कोयल कुहू- कुहू कर बोली
कोयल कुहू- कुहू कर बोली।
उठो बालको आई होली।।
फूल खिले हैं क्यारी -क्यारी।
रंग-बिरंगी है तैयारी।।
गेंदा और गुलाब महकते।
जिन पर तितली भ्रमर चहकते।।
जंगल- जंगल दहकन कैसी।
आग लगी हो वन में ऐसी।।
टेसू लाल-लाल हैं फूले।
कीट – पतंगे डालें झूले।।
सरर-सरर बह रहीं हवाएँ।
भरी गलन में धूप तपाए।।
‘शुभम्’ लगे वसंत ऋतु आई।
चलती शीतल सद पुरवाई।।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’
