हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – फूल’ बनाओ!

बचपन में हमें प्राथमिक कक्षाओं से ही फूल बनाने की कला में पारंगत करने की कला का अभ्यास कराया जाता था और कक्षा तीन से ही ड्राइंग की कॉपी रंग ब्रुश और पेंसिल से फूल बनाने लगते थे। जैसे-जैसे उच्च कक्षाओं में चढ़ते गए ,फूल बनाने की कला में निपुणता प्राप्त करते गए। गुडहल कमल गुलाब और गेंदा के न जाने कितने फूल बना डाले।फूल बना -बना कर ड्राइंग की कॉपियाँ भरते गए और फूल बनाने की कला में पारंगत होते चले गए। पाँच -छः वर्षों तक बहुत सारे फूल बनाए और गुरुजनों की वाहवाही भी पाए। फूलों के साथ-साथ पत्तियाँ भी बनाईं,किंतु प्रमुखता फूलों ने ही पाई। आप सबने भी खूब फूल बनाए होंगे और शाबाशी के प्रमाण पत्र घर लाए होंगे।

आज और अब तो फूल बनाने वालों की बाढ़ आ गई है। नेता जनता को बना रहा है, अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी को बना रहा है, व्यापारी ग्राहक को बना रहा है, और कुछ राजनीतिक दल को किसको नहीं बना रहे हैं। फूल बनाने का यह ऐसा जमाना आ गया है कि इसका नाम ही बदलने का मन करता है। इसे कलयुग के स्थान पर क्यों न ‘फूल’ युग ‘कहा जाए ! फूल बनाने की कुछ ऐसी रीति चली है कि पत्नी पति को, पति पत्नी को, संतान इन दोनों को फूल बनाने पर तुल गई है। और सबसे बड़ी बात यह है कि वे बन भी रहे हैं। फूल है ही ऐसी चीज कि जिसकी सुंगन्ध और आकर्षण में कोई भी बंध जाता है। और जब तक फूल से फल या पेड़ नहीं बन जाता ,तब तक उसे पता ही नहीं लग पाता कि उसे फूल बनाया गया था। अब तो नई नवेली दुल्हिनें अपने पति को भी फूल बनाने से नहीं चूक रहीं। वे सोती किसी के साथ हैं और सपने किसी और के देखती हैं। एक के द्वारा देखे गए सपनों का भला किसी को पता भी कैसे चले ? देश और दुनिया में फूलों की बहार आई हुई है। फूल बनाने में कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता ।

मिलावटखोरों ने तो फूल बनाने के मानक स्थापित कर दिए हैं।भैंस वाला दूध में पानी मिलाकर, घी वाला चर्बी का घी बनाकर, कुंजड़ा धनिए में गधे की लीद, हल्दी और मिर्च में रंग, काली मिर्च में पपीते के बीज ,दालों में पत्थर मिला मिला कर आम और खास सबको ही फूल बना रहे हैं।

फूल बनाना विरासत में मिला है।इसलिए आदमी इस कला में पारंगत हो गया है। अब तो कवि लोग भी श्रोताओं को फूल बनाने में कोई कोर कसर शेष नहीं छोड़ रहे। वे लतीफेबाजी को कवि सम्मेलन कहते हैं और केवल हास्य ही उनकी कविता के दायरे में आता है। आजकल के श्रोता भी बड़े प्रेम से फूल बन रहे हैं।और वे हँसोड़ लतीफ़ेबाजों को कवि समझ रहे हैं और तालियों की बौछार कर उनका उत्साहवर्द्धन कर रहे हैं। इन चुटकुलेबाजों ने सरस्वती माँ को भी फूल बनाने में कमी नहीं छोड़ी। उन्हें वास्तविक और साहित्यिक कविता से कोई मतलब नहीं है।बस अपने शब्दजाल से जनता को फूल बनाने का गुर हासिल कर लूट कर रहे हैं।

आदमी नाम के जीव की चतुराई ज्यों-ज्यों बढ़ती जाएगी,फूल बनाओ कला भी नए मील के पत्थर गाड़ती जाएगी। स्वयं फूल बनना कोई नहीं चाहता,सब अपने समीपस्थ को ही फूल बनाने पर तुले हुए हैं। कोई किसी से पीछे क्यों रहे !यह फूल बनाना व्यक्ति की आय का एक मजबूत स्रोत बन गया है। जब फूलों की संख्या पत्तियों से अधिक हो जाएगी तो आदमी अमलतास का पेड़ ही बन जायेगा। पत्तियाँ रहेंगीं ही नहीं तो फूलों का बिछौना होगा। यह खतरनाक स्थिति देश और समाज के लिए अच्छी नहीं है। यह बुद्धि का छल प्रपंच है,जो आदमी को विनाश की ओर ले जा रहा है। मजे की बात ये है कि व्यक्ति इसे स्व विकास समझ रहा है। जबकि यह उसके समाज और देश के विनाश का संकेत है। ये सब धतूरे के फूल हैं,जिनमें सुगंध नहीं, दुर्गंध ही होती है। धतूरे के पौधे पर फूल झड़ने के बाद जहरीले और नशीले फल ही आते हैं ,उन पर आम या सेव नहीं फलते। ये फूलबाजी मानव मात्र के लिए घातक विष है। जो उसे विनाश की ओर ले जा रही है।

— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’

*डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

पिता: श्री मोहर सिंह माँ: श्रीमती द्रोपदी देवी जन्मतिथि: 14 जुलाई 1952 कर्तित्व: श्रीलोकचरित मानस (व्यंग्य काव्य), बोलते आंसू (खंड काव्य), स्वाभायिनी (गजल संग्रह), नागार्जुन के उपन्यासों में आंचलिक तत्व (शोध संग्रह), ताजमहल (खंड काव्य), गजल (मनोवैज्ञानिक उपन्यास), सारी तो सारी गई (हास्य व्यंग्य काव्य), रसराज (गजल संग्रह), फिर बहे आंसू (खंड काव्य), तपस्वी बुद्ध (महाकाव्य) सम्मान/पुरुस्कार व अलंकरण: 'कादम्बिनी' में आयोजित समस्या-पूर्ति प्रतियोगिता में प्रथम पुरुस्कार (1999), सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मलेन, नयी दिल्ली में 'राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्राब्दी साम्मन' से अलंकृत (14 - 23 सितंबर 2000) , जैमिनी अकादमी पानीपत (हरियाणा) द्वारा पद्मश्री 'डॉ लक्ष्मीनारायण दुबे स्मृति साम्मन' से विभूषित (04 सितम्बर 2001) , यूनाइटेड राइटर्स एसोसिएशन, चेन्नई द्वारा ' यू. डब्ल्यू ए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित (2003) जीवनी- प्रकाशन: कवि, लेखक तथा शिक्षाविद के रूप में देश-विदेश की डायरेक्ट्रीज में जीवनी प्रकाशित : - 1.2.Asia Pacific –Who’s Who (3,4), 3.4. Asian /American Who’s Who(Vol.2,3), 5.Biography Today (Vol.2), 6. Eminent Personalities of India, 7. Contemporary Who’s Who: 2002/2003. Published by The American Biographical Research Institute 5126, Bur Oak Circle, Raleigh North Carolina, U.S.A., 8. Reference India (Vol.1) , 9. Indo Asian Who’s Who(Vol.2), 10. Reference Asia (Vol.1), 11. Biography International (Vol.6). फैलोशिप: 1. Fellow of United Writers Association of India, Chennai ( FUWAI) 2. Fellow of International Biographical Research Foundation, Nagpur (FIBR) सम्प्रति: प्राचार्य (से. नि.), राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सिरसागंज (फ़िरोज़ाबाद). कवि, कथाकार, लेखक व विचारक मोबाइल: 9568481040