कविता

मैं और मेरी ख्यालातें

सोचा था झूले को धक्का मारके,

पीछे हट जाऊं..

जैसे जैसे झूला ज़मीन से आसमान छूने लगेगा,

धीरे धीरे मैं झूले के पीछे से और पीछे चली जाऊं,

ताकि मुझसे टकराके झूले की गति मंद न हो जाए।

लेकिन जब भी वो आसमान की तरफ से,

फिर से जमीन की ओर आने लगे,

उस वक्त मेरी मौजूदगी जरूर वहा होगी,

झूले का हौसला बढ़ाने।

ऊपर जाते झूला देख छलकती मेरी निगाहें,

उन दुआओं से भरी रहेंगी हमेशा,

कि तुम हमेशा तरक्की की ओर ही बढ़ पाओ,

मेरी मौजूदगी और गैरमौजूदगी में भी।

लेकिन कभी भी कहीं तुम थक जाओ,

तो न भूलना कि मेरी बाहें तुम्हारी थकावट थमाने यहां खड़ी हैं।

चाहे मैं अंदर से टूटती जाऊं, फिर भी तुमको टूटने न दूंगी।

ताना, मार, गुस्सा, तनाव, कमियां अपने सीने में दबोचके,

तुमसे हुए पवित्र प्रेम से मेरा शरीर लपेटके,

चलती रहूंगी मैं उस राह पे,

जहां मैं और मेरी ख्यालातें अपनी छोटी सी दुनिया में गोते खाएं।।

कलणि वि. पनागॉड

श्री लंका में जन्मी सिंहली मातृभाषी आधुनिक कवयित्री है, जो वर्तमान में भारत में एक शोध छात्रा के रूप में कार्यरत है।