नृसिंह चतुर्दशी – अधर्म के विनाश और भक्ति की विजय का पर्व
यह तो हम सभी जानते हैं कि कृतयुग जिसे हम सतयुग के नाम से जानते हैं में महर्षि कश्यप और दिति के दो पुत्र हुवे थे, जिसमें ज्येष्ठ पूत्र का नाम हिरण्यकश्यप और छोटे वाले का नाम हिरण्याक्ष रखा गया। हिरण्यकश्यप ने सृष्टि के रचयिता चतुरानन यानि ब्रह्माजी की कठोर तपस्या कर “वह न मनुष्य से मरे, और न ही पशु से, न दिन में मरे,और न ही रात में, न अस्त्र से मरे, और न ही शस्त्र से, न ही घर के भीतर मरे, और न ही बाहर वरदान” प्राप्त कर अहंकारी तो हुवा ही साथ में अत्याचारी भी हो गया। यह वरदान प्राप्त कर उसने आपने आपको भगवान घोषित कर सभी से प्रभु विष्णु की पूजा छोड़ देने को कहा।लेकिन उसका अपना लड़का प्रह्लाद प्रभु विष्णु की पूजा-अर्चना छोड़ने को तैयार नहीं था, जिसके चलते हिरण्यकश्यप उससे न केवल नाराज रहता बल्कि उसे कई तरीकों से प्रताड़ित करने लगा।जब बालक प्रह्लाद अपनी विष्णु भक्ति पर पूरी दृढ़ता से बढ़ते हुवे उसकी प्रताड़ना को हँसते-हँसते सहना सीख लिया तब हिरण्यकश्यप और ज्यादा बैचेन हो, उसको मृत्यु दण्ड का निश्चय कर, उसे मारने के लिए कई प्रयास किये, लेकिन हर बार वह पूरी तरह विफल रहा।
इस दानव की होलिका नाम की बहन के पास एक ऐसी चुनरी थी जिसे ओढ़कर वह आग में बैठ भी जाय, तो आग उसे जला नहीं सकती थी। इसलिये उसने अपनी बहन से, प्रह्लाद से मुक्ति पाने में सहायता चाही। उसकी बहन होलिका ने अपने भाई को सहायता का वचन दे,चुनरी ओढ़कर प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गयी। परन्तु प्रह्लाद की विष्णुभक्ति की वजह से हवा ऐसी चली कि चुनरी उड़ कर आपने आप प्रह्लाद पर हो गयी अर्थात प्रह्लाद को पूर ढक लिया जिसके चलते होलिका तो अग्नि में जलकर खाक हो गई और प्रह्लाद सकुशल धधकती अग्नि से बाहर आ गया।
अब जब प्रह्लाद बच गया तब अपने अन्तिम प्रयास में हिरण्यकश्यप ने वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तिथि को साँयकाल समय में आपने महल के एक लोहे के एक खंभे को गर्म कर इतना ज्यादा लाल कर दिया जिससे आस-पास का वातावरण एकदम गरम हो उठा और उसी समय बिना समय गवायें उसने प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा ताकि वो मृत्यु को प्राप्त हो जाय।लेकिन जैसे ही विष्णु भक्त प्रह्लाद खंभे के नजदीक पहूँचा ही था, उस खंभे से प्रभु विष्णु,अपने भक्त को बचाने, आधा सिंह, आधा मानव का रूप ले अर्थात नृसिंह रूप में प्रगट हो, हिरण्यकश्यप को महल के प्रवेशद्वार की चौखट पर, जो न घर का बाहर था और न ही भीतर, गोधूलि बेला में, जब न तो दिन था और न ही रात, अपनी जाँघों पर उठा अर्थात ना धरती पर मारा और न हीआकाश में, अपने लम्बे तेज़ नुकीले नाखूनों से जो न अस्त्र थे और न ही शस्त्र, उसका पेट चीर कर मार डाला।
उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि सर्वशक्तिमान प्रभु अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो, शक्तिशाली,अहंकारी और अत्याचारी का अन्त कर,अपने भक्त को उबार देते हैं।अतः विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हमें ईश्वर पर विश्वास और धर्म के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए।
— गोवर्द्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
