राजनीति

मीडिया से समाज की समस्याएं गायब हो चुकी हैं। 

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमला बोला है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक लड़की की कथित तौर पर हत्या किए जाने की घटना को लेकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज्य में बेटियां इतनी असुरक्षित क्यों हैं।राहुल गांधी ने एक्स’ पर लिखा, उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर में विश्वकर्मा समाज की एक बेटी के साथ बलात्कार और निर्मम हत्या – और फिर परिवार को प्राथमिकी दर्ज कराने से रोकने के लिए धमकियाँ, हिंसा। हाथरस, कठुआ, उन्नाव और आज ग़ाज़ीपुर, यह एक पैटर्न है। मणिपुर की बेटी ने न्याय की राह देखते-देखते दम तोड़ दिया।उन्होंने दावा किया, हर बार वही चेहरा, पीड़िता दलित, पिछड़ी, आदिवासी, ग़रीब। हर बार वही सच्चाई, अपराधी को संरक्षण, पीड़ित को प्रताड़ना। हर बार वही चुप्पी, सत्ता की, जिन्हें बोलना चाहिए था।गांधी ने कहा कि जिस देश और प्रदेश में माँ-बाप को अपनी बेटी की प्राथमिकी लिखवाने के लिए भीख माँगनी पड़े, उस देश की सरकार को सत्ता में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।उन्होंने कहा, दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई हो, परिवार को सुरक्षा मिले, उच्चस्तरीय जांच हो और तुरंत न्याय मिले। मोदी जी, मुख्यमंत्री जी जवाब दीजिए, आपके राज में बेटियां इतनी असुरक्षित क्यों हैं?गांधी ने कहा, ऐसे हालात में न्याय मांगा नहीं, छीना जाता है और हम छीनकर लाएंगे।इस मामले को लेकर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी बीजेपी सरकार पर हमला बोला है। प्रियंका गांधी ने एक्स पर कहा, गाजीपुर में एक लड़की की हत्या के मामले में पहले मामला दर्ज होने में आनाकानी, फिर पीड़ित परिवार को धमकियां मिलना और दबंगों द्वारा अराजकता फैलाना यह दिखाता कि प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार चरम पर है। बीजेपी राज में अब यही अघोषित कानून बन गया है कि जब भी किसी महिला पर अत्याचार होता है तो पीड़िता को ही और प्रताड़ित किया जाता है।उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं के संबंध में प्रधानमंत्री मोदी की बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ दिखावा हैं।प्रियंका गांधी ने कहा, उन्नाव हो, हाथरस हो, प्रयागराज हो या गाजीपुर, जहां भी महिलाओं के साथ अन्याय हुआ, बीजेपी अपनी पूरी सत्ता के साथ पीड़िता के खिलाफ, अत्याचारी के साथ खड़ी हो गई। देश भर की महिलाएं ये अंधेरगर्दी देख रही हैं।प्रिय पाठकों अब बात करते हैं मुख्य मुद्दे की। आज के दौर का मीडिया पूंजीपतियों का एक उद्योग है, और उद्योग को मुनाफे में रखने के लिए सामाजिक सरोकारों की नहीं बल्कि सनसनीखेज समाचारों को उत्पाद के तौर पर प्रस्तुत करना जरूरी है। मीडिया से समाज की समस्याएं गायब हो चुकी हैं और इसके बदले तिलिस्म को समाचार बता कर परोसा जा रहा है। पूंजीवाद ने दक्षिणपंथी विचारधारा को पूरी दुनिया पर लाद दिया है और इस विचारधारा की टूलबुक की शुरुआत ही महिलाओं के अधिकारों के दमन से शुरू होती है।साल 2017 से 2025 के बीच वैश्विक स्तर पर 1.14 अरब ऑनलाइन समाचारों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि साल 2025 में महिला उत्पीड़न और यौन-हिंसा से संबंधित समाचारों की संख्या कुल समाचारों की संख्या में महज 1.3 प्रतिशत रही, जो किसी भी वर्ष के मुकाबले सबसे कम है। ऐसे समाचारों की संख्या सर्वाधिक साल 2018 में रही, उस दौर में महिलाओं का चर्चित मी टू आंदोलन चरम पर था। अनेक अफ्रीकी देश लगातार गृह युद्ध की चपेट में रहे और महिलायें यौन-हिंसा का शिकार होती रहीं, पर अफ्रीकी मीडिया में वर्ष 2024 में कुल समाचारों में महज 1.18 प्रतिशत समाचारों में इनकी चर्चा थी।दुनिया में 9 में 1 महिला पिछले 12 महीनों में कम से कम एक बार हिंसा का शिकार हुई है। लगभग एक-तिहाई महिलायें अपने जीवनकाल में हिंसा का सामना कर चुकी हैं। सोशल मीडिया ने महिलाओं पर हिंसा का पैमाना बड़ा कर दिया है, लगभग 60 प्रतिशत महिलायें ऑनलाइन हिंसा का शिकार हैं। जाहिर है, महिलाओं का दमन किया जा रहा है और दूसरी तरफ मीडिया इस विषय पर खामोश होता जा रहा है। समस्या यह है कि, महिलाओं पर हिंसा के जो समाचार प्रकाशित होते भी हैं, उनमें महिलाओं की समस्या से अधिक दूसरे आयाम डालकर इन समाचारों को सनसनीखेज बनाए जाने का प्रयास रहता है। ऐसे समाचारों को महिलाओं पर हिंसा या लैंगिक असमानता की तरह नहीं बल्कि एक दुर्घटना की तरह प्रकाशित किया जाता है जिसमें पीड़ित महिला का दुख-दर्द छोड़कर सबकुछ रहता है।लैंगिक समानता की लगातार चर्चा करती मीडिया द्वारा महिलाओं के शोषण और उन पर होती हिंसा की उपेक्षा करना पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों की एक बड़ी विफलता है। यौन-हिंसा और महिला उत्पीड़न के अधिकतर समाचारों में भी लैंगिक असमानता, उत्पीड़न और हिंसा जैसे शब्द गायब रहते हैं, जबकि यही विषय समाचारों का आधार हैं। ऐसे समाचारों में अधिकतर वक्तव्य पुरुषों के रहते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार महिला उत्पीड़न के समाचारों में औसतन प्रति महिला के वक्तव्यों की तुलना में 1.5 पुरुषों, यानि डेढ़ गुणा, पुरुषों के वक्तव्य शामिल रहते हैं। ऐसे समाचारों में विशेषज्ञों के तौर पर जिनके वक्तव्य प्रकाशित किए जाते हैं, उनमें पुरुषों की संख्या ही अधिक रहती है।हमारे देश में जब भी महिलाओं पर हिंसा की घटनाएं होती हैं, सबसे पहले पीड़िता और आरोपी का धर्म देखा जाता है। यदि पीड़िता बहुसंख्यक है और आरोपी किसी और धर्म का- तब पुलिस, मीडिया और न्यायपालिकाओं को हिंसा समझ में आती है- वरना अल्पसंख्यक समुदायों की पीड़ित महिलाओं को न्याय नहीं बल्कि चरित्र-हनन का सामना करना पड़ता है और ऊंची जाति के आरोपी को न्याय व्यवस्था और अनेक मामलों में मीडिया भी बचाने में लग जाती है।वहीं दूसरे धर्मों के आरोपियों के घर अचानक से अवैध करार दे दिए जाते हैं और इन्हें आनन-फानन में बुलडोजर से गिरा दिया जाता है और इस तमाशे का सीधा प्रसारण सभी समाचार चैनलों पर किया जाता है। हमारा मीडिया महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं को धार्मिक एजेंडे में बदल देती है। ऐसे में मीडिया के समाचारों के सुर ही पूरे बदल जाते हैं। यदि आरोपी सत्ता में रसूख वाला व्यक्ति है तब तो उसे बचाने पूरी सत्ता ही कैमरे के सामने पहुंच जाती है।ऐसा ही हाल पूरी दुनिया में तहलका मचाने वाली एपस्टीन फाइल मामले का है। इस मामले से पूरी दुनिया के राजनैतिक नेताओं, पूंजीपतियों और अपराधियों द्वारा महिलाओं पर हिंसा के संगठित कारोबार का खुलासा हुआ। इसकी कभी-कभी रिपोर्टिंग मीडिया में की जाती थी और विदेशी नेताओं और पूंजीपतियों के नाम भी बताए जाते थे, पर जब से हमारे देश के सत्ता के शीर्षस्थ नेताओं के नाम सामने आए- यह पूरा मुद्दा ही मीडिया से गायब हो गया।इस रिपोर्ट में वर्ष 2017 से फरवरी 2026 के बीच एपस्टीन फाइल से संबंधित वैश्विक मीडिया में प्रकाशित 10 लाख से अधिक समाचारों का विश्लेषण किया गया है। इन समाचारों में सनसनीखेज नामों पर खूब चर्चा की जाती है पर लैंगिक असमानता, महिलाओं पर हिंसा या समाज की पितृसत्तात्मक विचारधारा का शायद ही कभी उल्लेख रहता है। इन दस लाख समाचारों में महज 1 प्रतिशत में महिलाओं पर हुए अपराधों का जिक्र है और 0.1 प्रतिशत समाचारों में हिंसा या लैंगिक असमानता का उल्लेख है।देश में गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो हरेक वर्ष अपराध के आंकड़े प्रकाशित करता था, इसमें महिलाओं पर अपराध के बारे में भी अलग से आंकड़े होते थे। पर, वर्ष 2023 के बाद के आंकड़े अभी तक प्रकाशित नहीं किए गए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 की तुलना में महिलाओं से संबंधित अपराध वर्ष 2022 में अधिक दर्ज किए गए और वर्ष 2023 में इन दोनों वर्षों से भी अधिक मामले दर्ज किए गए।

— जुनैद मलिक अत्तारी

जुनैद मलिक अत्तारी

स्वतंत्र लेखक पत्रकार नई दिल्ली

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