गीत/नवगीत

हसरतों के मोती

कितनी हसरतों से हमने इक ख्वाब सजाया था,
बिखरे हुए मोतियों से जख्मों को पिरोया था।
कैसे लहराऊं मैं उम्मीद की इन पंखुड़ियों को,
हर तरफ़ देखा तो जमाने को मुझसे गिला था।।

कितनी हसरतों से हमने इक ख्वाब सजाया था।
बिखरे हुए मोतियों से जख्मों को पिरोया था।।

सोचती रह गई जमाने को उम्र भर मैं यूं ही,
नरफ़रतों के हर दौर से गुज़रती गई यूं ही।
कैसे बयां करूं मैं सरहदों की नफ़रतों को,
हम तो बेवजह शहर में बदनाम हो गये यूं ही।।

कितनी हसरतों से हमने इक ख्वाब सजाया था।
बिखरे हुए मोतियों से जख्मों को पिरोया था।।

आसमां की वो दोपहरी की धधकती धूप में,
राहों में बिछी कंटीली चादर की चकाचौंध में।
बहुत संजोया है मैंने खुद के पैरों की चुभन को,
सोचती हूं कि कैसे चलूं मैं शहर की इन पंक्तियों में।।

कितनी हसरतों से हमने इक ख्वाब सजाया था।
बिखरे हुए मोतियों से जख्मों को पिरोया था।।

पर्वतों से बहती धाराएं पत्थरों को चीरती चली गई,
समुद्र की इन गहराइयों में,लहरों संग तैरती चली गई।
किसे सुनाऊं मैं हाले दिल सफ़र का ये सिलसिला,
पत्थरों से बने ज़ख्मों को मरहम लगाती चली गई।।

कितनी हसरतों से हमने इक ख्वाब सजाया था।
बिखरे हुए मोतियों से जख्मों को पिरोया था।।

— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)