मुक्तक/दोहा

दोहा

माना मैं तो मूढ़ हूँ, तुम हो गुणी महान।
दिया मित्र यमराज ने, मुझे मुफ्त का ज्ञान।।

ऐसा क्यों अब हो रहा, लोगों का व्यवहार।
जिसमें अपनापन नहीं, निष्ठुर प्रेम, दुलार।।

मर्यादाएं मर रहीं, देख रहा है कौन।
दोषी भी हम आप हैं, इसीलिए तो मौन।।

रिश्तों में भी दिख रहा, भेदभाव पुरजोर।
शर्मसार कलयुग कहे, अंधकार घनघोर।।

कलयुग को दोषी कहें, बड़े गर्व से लोग।
नीति नियम सिद्धांत को, मान रहे जो रोग।।

जीवन के इस दौड़ में, हाँफ रहे लोग।
पीछा नहीं है छूटता, बढ़े नित्य नव रोग।।

माया के इस जाल में, उलझा है इंसान।।
जीवन के घुड़दौड़ में, किसे याद भगवान।।

आप भरोसा कीजिए, सोच-समझकर यार।
नहीं पता विश्वास के, पीछे छुपी कटार।।

ऊपर मीठा बोलते, मन में जहर अपार।।
किसके मन में क्या छुपा, वार करेगा यार।।

खंजर छुपा के दे रहे, रिश्तों को आधार।
भेद ले रहे प्रेम से, बस उनका है सार।।

आया संकट सामने, करिए सभी विचार।
कहीं युद्ध की भेंट ये, चढ़े नहीं संसार।।

आया संकट सामने, जनता है लाचार।
लाइन में हैं आमजन, गैस आस दरकार।।

सारी दुनिया युद्ध की, झेल रही है मार।
आया संकट सामने, मत करिए तकरार।।

मन का मैल मिटाइए, रहिए मिलकर साथ।
छोटी छोटी बात पर, नहीं छोड़िए हाथ।।

जिसके मन में मैल है, खुशियाँ उससे दूर।
पर बेचारे क्या करें, आदत से मजबूर।।

तन के मैल को हम सभी, हटा रहे हैं रोज।
हृदय मलिनता दूर हो, राहें भी तो खोज।।

आप सभी हम जानते, इस दुनिया का रोग।
सजे -धजे बाजार में, भाँति-भाँति के लोग।।

निर्धन है कब चाहता, कोई माने हीन।
जीवन यापन के लिए, बजा रहा वो बीन।।

सारा खेल है युद्ध का, दुनिया जाने मेल।
निकल रहा संसार का, अर्थव्यवस्था तेल।।

माहिर हैं कुछ लोग जो, समझ रहे हैं भाव।
कालाबाजारी तेल से, देते गहरा घाव।।

तेल लगाना सीखिए, बड़ी जरूरत आज।
स्वार्थ सिद्ध हो सहज ही, कठिन लगे जो काज।।

मन बेकाबू सा उड़े, पकड़े रहो लगाम।
अति उत्साही ही कहीं, जाकर गिरे धड़ाम।।

मन बेकाबू सा उड़े, चिंता की ये बात।
कैसे थामूँ मैं इसे, सोच रहा दिन रात।।

मन बेकाबू सा उड़े, बिना किसी आधार।
कहीं हाथ से एक दिन, छूटे ना पतवार।।

संहारा श्री कृष्ण ने, मामा अपने कंस।
संग सुदामा मित्रता, अमर हुआ यदुवंश।।

कृष्ण-सुदामा मित्रता, लिखा अमर आयाम।
अपने मामा कंस का, जीवन काम तमाम।।

धरती – पुत्र किसान का, बहे पसीना खेत।
फिर भी उसके लाभ की, फिसल रही है रेत।।

समय साथ बदलाव में, ढलते आज किसान।
भला मशीनीकरण से, बचा कौन इंसान।।

जो जितना धनवान है, उतना उसे गुरूर।
अपनों से ही रोज वो, होता जाता दूर।।

जो जितना धनवान है, कहे भाग्य का खेल।
कंजूसी जमकर करे, नहीं लगाए तेल।।

जो जितना धनवान है, उतना ले प्रभु नाम।
ईश कृपा सब मानकर, करता अपना काम।।

उतना ही वो रो रहा, जो जितना धनवान।
भले द्वार पर हो खड़ा, गाड़ी घोड़ा विमान।।

उतना बाँटे ज्ञान वो, जो जितना धनवान।
भले कोई कहता फिरे, ये उसका अभिमान।।

खेत और खलिहान का, सिमट रहा आधार।
इस पर भी अब ध्यान दे, जनता की सरकार।।

खेत और खलिहान में, फसलों का दरबार।
दुखी कृषक परिवार हैं, मौसम ठाने रार।।

जीवन में होता नहीं, अनायास कुछ काम।
जीवन पथ का है यही, सुख-दुख का आयाम।।

अनायास जो चाहते, मिल जाता परिणाम।
सुख-दुख जो भी हृदय में, करना पड़े प्रणाम।।

हलधर को हम मानते, रखें राष्ट्र का मान।
अन्न उगाते खेत में, इतनी सी पहचान।।

हलधर की थी कल तलक, हल से ही पहचान।
भाता इनको आज है, तकनीकी कृषि ज्ञान।।

प्रत्याशित फल हर समय, मिलना है अपवाद।
खुश रहिए जो भी मिला, दूर रहे अवसाद।।

सभी चाहते हैं सदा, प्रत्याशित परिणाम।
भले करें वो सब नहीं, नीति नियम से काम।।

ज्ञान सरोवर बह रहा, करिए डूब नहान।
हृदय मनन चिंतन करो, बनो नहीं अंजान।।

मर्यादा का दायरा, नहीं लाँघना आप।
ज्ञान सरोवर पावनी, मैला करना पाप।।

घर में करें प्रवेश जब, बाहर छोड़ें शेष।
चिंता शंका मुक्त हों, कोस दूर हो द्वेष।।

व्यर्थ अपेक्षा किसी से, देता है संताप।
आशाओं के बोझ से, हो जाता है पाप।।

नहीं उपेक्षा कीजिए, कभी सभी से आप।
कहते कवि यमराज जी, होता भारी पाप।।

छोड़ अयोध्या वन चले, पहुँचे गंगा तीर।
समझा था प्रभु राम ने, केवल मन की पीर।।

कहाँ सभी के भाग्य में, माँ का दूध नसीब।
सदा कोसते स्वयं को, क्यों हम रहे गरीब।।

तकनीकों के जाल से, बछड़ा है मजबूर।
माँ की ममता रो रही, बच्चा दूध से दूर।।

चाहे जितना आजकल, रहो धीर गंभीर।
सहना नियती आपकी, दूजा हिस्से पीर।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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