देह ही मंदिर है
मानव शरीर को संतों ने नौ दरवाजों वाला नगर कहा है, और उसी नगर में एक ऐसा गुप्त द्वार बताया है जो आँखों से नहीं दिखता, पर खुल जाए तो सीधे परमात्मा से मिला देता है। यह लेख उसी गुप्त द्वार की खोज है।
वेद कहता है, “देहो देवालयः प्रोक्तः”। कबीर कहते हैं, “कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माहिं”। हम बाहर तीर्थ, मूर्ति, आकाश में ईश्वर खोजते हैं, जबकि शास्त्र, संत और योग तीनों एक स्वर में कहते हैं कि परमात्मा की बैठक शरीर के भीतर है।
बाहर के नौ द्वार तो सबको दिखते हैं, दो आँख, दो कान, दो नासिका, मुख, मलद्वार और मूत्रद्वार। इन्हीं से संसार भीतर आता है और भीतर का बाहर जाता है। पर जब तक चेतना इन्हीं नौ में भटकती है, वह बिखरी रहती है। दसवां द्वार, जिसे दशम द्वार, ब्रह्मरंध्र, गगन मंडल, त्रिकुटी का पर्दा, शून्य महल, या सुरत का द्वार कहा गया, वह भीतर की ओर खुलता है। वही गुप्त द्वार है जहाँ से जीव परमात्मा की अनुभूति करता है।
नव द्वार: संसार से संबंध
दो नेत्र: रूप का द्वार। यहीं से मन बाहर भागता है।
दो श्रोत्र: शब्द का द्वार। निंदा स्तुति यहीं से भीतर जाती है।
दो नासिका: प्राण का द्वार। श्वास के साथ जीवन शक्ति आती जाती है।
मुख: वाणी और अन्न का द्वार।
उपस्थ और गुदा: विसर्जन के द्वार।
गीता में श्रीकृष्ण ने इसे “नवद्वारे पुरे देही” कहा। यह नगर जरूरी है, पर यही बंधन भी है। जब तक सुरत इन्हीं में उलझी है, वह बाहरमुखी है।
संतों ने कहा, इन नौ को “बंद करो” का अर्थ इन्द्रियों को मारना नहीं, बल्कि चेतना को समेटना है। आँख खुली रहे पर देखे नहीं, कान खुले रहें पर सुने नहीं, अर्थात ध्यान भीतर मुड़े।
दसवां गुप्त द्वार कहाँ है
यह कोई हड्डी का छेद नहीं। उपनिषद इसे हृदयाकाश में स्थित बताते हैं, योग इसे मस्तिष्क के शीर्ष पर सहस्रार में, संत मत इसे दोनों भौंहों के मध्य पीछे त्रिकुटी में।
तीन मुख्य संकेत मिलते हैं:
ब्रह्मरंध्र: खोपड़ी के सबसे ऊपर तालु का सूक्ष्म स्थान। जन्म के समय शिशु में यहाँ स्पंदन होता है। योगी कहते हैं यहीं से प्राण निकलने पर मुक्ति होती है।
त्रिकुटी: आज्ञा चक्र के पीछे, जहाँ इड़ा पिंगला मिलकर सुषुम्ना में लय होती हैं। यहाँ एक पतला पर्दा है, जिसे संत “बंक नाल” कहते हैं।
शून्य महल: सहस्रार से ऊपर, जहाँ नाद और प्रकाश का अनुभव होता है। गुरु नानक ने जपुजी में कहा, “दसवें दुआरि अगम अपारा”।
यह द्वार गुप्त इसलिए है क्योंकि यह मांस से नहीं, चेतना से बना है। जब तक मन बहिर्मुखी है, यह बंद रहता है। जब सुरत सिमटती है, तो यह स्वयं खुलता है।
संत वाणी में प्रमाण
कबीर साहेब: “नौ दरवाजे दसवां खिरकी, तामें जोत अनूप।” वे कहते हैं, नौ को बंद कर दसवीं खिड़की खोलो, वहाँ बिना तेल बाती का प्रकाश है।
गुरु नानक देव: “नव घर थापे थापणहारे, दसवै वासा अलख अपारे।” नौ घर बनाए, पर वह अलख दसवें में बसता है।
दादू दयाल: “इह घट भीतर महल है, तामें साहिब होय।” शरीर के भीतर ही महल है।
तुलसीदास: “सहस्रार में गगन गुफा, तहाँ झरै अमृत धारा।”
सबने एक ही भूगोल बताया, बाहर नहीं, भीतर ऊपर की ओर।
योग शास्त्र: सीढ़ी का नक्शा
योग ने इस गुप्त द्वार तक पहुँचने की सीढ़ी को चक्रों में बाँटा।
मूलाधार: गुदा मूल में, पृथ्वी तत्व। यहीं कुंडलिनी शक्ति सोई है।
स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध: क्रमशः जल, अग्नि, वायु, आकाश।
आज्ञा चक्र: भ्रूमध्य। यहीं इड़ा पिंगला समाप्त होती हैं। इसे ही त्रिवेणी कहते हैं।
सहस्रार: शीर्ष पर हजार पंखुड़ियों वाला कमल। यही ब्रह्मरंध्र का मुख।
सुषुम्ना नाड़ी इन सबको जोड़ने वाली राजमार्ग है। जब प्राण इड़ा पिंगला से हटकर सुषुम्ना में चलता है, तब चेतना ऊपर चढ़ती है। कुंडलिनी जागरण का अर्थ कोई चमत्कार नहीं, बल्कि बिखरी हुई जीवन ऊर्जा का एकत्र होकर ऊपर की ओर बहना है।
तंत्र में इसे “बंक नाल” कहा, टेढ़ी नली जो त्रिकुटी से ऊपर जाती है। जब तक मन में वासना, क्रोध, अहंकार है, यह नली सिकुड़ी रहती है। शुद्ध भाव से यह सीधी होती है।
द्वार खोलने की कुंजी: शब्द और सुरत
संत मत ने सबसे सरल मार्ग दिया, सुरत शब्द योग। सुरत माने ध्यान की धारा, शब्द माने भीतर का अनहद नाद।
कबीर कहते हैं, “शब्द बिना सुरत आंधरी”। बाहर के शब्द नहीं, भीतर का ध्वनि प्रवाह जो बिना जीभ, बिना कान के सुनाई देता है। इसे अनहद, ओंकार ध्वनि, कलमा, बांग ए आसमानी भी कहा।
तीन साधन मिलकर द्वार खोलते हैं:
नाम सिमरन: किसी जाग्रत गुरु से प्राप्त धुन पर मन को टिकाना। यह मन को नौ द्वारों से खींचता है।
ध्यान: भ्रूमध्य में प्रकाश बिंदु पर सुरत को स्थिर करना। आँखें बंद, दृष्टि भीतर।
भजन: भीतर उठते शब्द को सुनना। पहले झींगुर, घंटा, शंख, फिर मेघ गर्जन, फिर वीणा।
जब सुरत शब्द में लय होती है, त्रिकुटी का पर्दा हिलता है। यही गुप्त द्वार का खुलना है।
क्रमिक साधना विधि
यह कोई एक दिन की बात नहीं। संतों ने क्रम बताया है।
पहला चरण, यम नियम: सत्य, अहिंसा, शुद्ध आहार। शरीर हल्का होगा तो प्राण ऊपर उठेगा। उत्तेजक भोजन, नशा, हिंसा सुषुम्ना को अवरुद्ध करते हैं।
दूसरा चरण, आसन प्राणायाम: स्थिर सुखासन। नाड़ी शोधन प्राणायाम से इड़ा पिंगला सम होती है। यह द्वार की सफाई है।
तीसरा चरण, प्रत्याहार: रोज 20 मिनट इन्द्रियों को समेटो। आँख बंद कर बाहर के रूप मत सोचो, कान से बाहर की आवाज मत पकड़ो। मन को भीतर लाओ।
चौथा चरण, धारणा: भ्रूमध्य में प्रकाश या गुरु स्वरूप पर टिकाव। मन भागे तो प्रेम से लौटाओ।
पाँचवाँ चरण, सिमरन: श्वास के साथ नाम। नानक ने “सास गिरास” कहा। हर आती जाती श्वास में नाम घुले।
छठा चरण, नाद श्रवण: रात की शांति में दाहिना कान भीतर मोड़ो। पहले बायें कान में सांसारिक ध्वनि आएगी, फिर दाहिने में सूक्ष्म ध्वनि। उसी को पकड़ो।
सातवाँ चरण, समर्पण: द्वार अहंकार से नहीं खुलता। “मैं खोलूँगा” भाव ही बंधन है। गुरु कृपा और प्रेम से पर्दा हटता है।
रोज दो समय, ब्रह्म मुहूर्त और संध्या, अभ्यास करने से महीनों में चेतना सिमटने लगती है।
अनुभव के लक्षण
शास्त्र चेतावनी देते हैं, अनुभव को कसौटी मत बनाओ, पर पहचान के लिए संकेत दिए हैं।
भ्रूमध्य में नीला, सुनहरा प्रकाश बिंदु। स्थिर होने पर वह फैलता है।
भीतर घंटा, शंख, बीन जैसी ध्वनि बिना कान के सुनाई देना।
शरीर हल्का, श्वास बहुत धीमी, समय का भान मिटना।
आँखों में बिना कारण आँसू, हृदय में अकारण प्रेम।
जब त्रिकुटी पार होती है, साधक को अपना शरीर नीचे छूटा हुआ दिखता है, ऊपर अनंत प्रकाश। यही दशम द्वार का खुलना है। इसे संतों ने “मौत से पहले मरना” कहा।
बाधाएँ जो द्वार बंद रखती हैं
बिखरा मन: दिन भर मोबाइल, गपशप, क्रोध में शक्ति नौ द्वारों से बहती है।
अहंकार: मैं ज्ञानी हूँ, मैं खोल लूँगा, यह भाव पर्दा और मोटा करता है।
सिद्धियों का लोभ: प्रकाश दिखा तो प्रदर्शन की इच्छा। संत कहते हैं, सिद्धि द्वारपाल है, रिश्वत लेकर रोक लेती है।
अशुद्ध आहार विहार: भारी भोजन, देर रात जागरण से सुषुम्ना में जड़ता आती है।
परमात्मा प्राप्ति का अर्थ क्या है
यह कोई व्यक्ति का मिलना नहीं। जब सुरत दसवें द्वार से पार जाती है, वहाँ न कोई रूप, न भाषा, केवल शुद्ध चेतना, अनंत प्रकाश और अनहद नाद। कबीर ने कहा, “जस पानी में पानी मिल गयो”। बूँद सागर में मिलती है, मिटती नहीं, सागर हो जाती है।
इस अवस्था में बाहर का संसार छूटता नहीं, दृष्टि बदलती है। वही आँखें, वही कान, पर अब वे नौ द्वार बहिर्मुखी नहीं रहे, वे भीतर के प्रकाश से भर जाते हैं। तब व्यक्ति चलते फिरते भी उस द्वार में स्थित रहता है, इसे ही सहज समाधि कहा।
उपसंहार: लौटो अपने घर
मानव देह एक अद्भुत यंत्र है। नौ द्वार इसे संसार से जोड़ते हैं, ताकि हम जिएँ, सीखें, प्रेम करें। पर दसवां गुप्त द्वार इसे परमात्मा से जोड़ता है, ताकि हम जानें हम कौन हैं।
यह द्वार किसी जाति, धर्म, ग्रंथ का मोहताज नहीं। यह हर श्वास लेने वाले के भीतर है। इसे खोलने के लिए हिमालय नहीं जाना, बस ध्यान को उल्टा मोड़ना है। बाहर से भीतर, शब्द से शून्य, रूप से अरूप।
संतों ने रास्ता दिखा दिया। अब चलना हमारा काम है। रोज थोड़ा समय निकालो, नौ को समेटो, एक को सुनो। जिस दिन वह पर्दा हिला, तुम्हें समझ आएगा कि परमात्मा कभी दूर था ही नहीं, वह तो तुम्हारे ही भीतर, तुम्हारी ही प्रतीक्षा में, उस गुप्त द्वार के पीछे बैठा था।
— शिवभूषण सिंह
