राजनीति

कांग्रेस और आंबेडकर का टकराव : सत्ता, समाज और समानता का संग्राम

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष की कथा नहीं है, बल्कि वह भारतीय समाज के भीतर चल रहे वैचारिक संघर्षों का भी इतिहास है। इसी संघर्ष के केंद्र में दो बड़े प्रश्न थे—राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता। एक ओर कांग्रेस और गांधीवादी राजनीति राष्ट्रीय स्वतंत्रता को सर्वोच्च लक्ष्य मान रही थी, तो दूसरी ओर डॉ. भीमराव आंबेडकर यह चेतावनी दे रहे थे कि यदि भारतीय समाज के भीतर सदियों से मौजूद जातिगत अन्याय और सामाजिक विषमता को समाप्त नहीं किया गया, तो स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन बनकर रह जाएगी। यही वह बिंदु था जहाँ से कांग्रेस, गांधी और आंबेडकर के बीच गहरे वैचारिक मतभेद उभरते हैं। इन मतभेदों को केवल राजनीतिक टकराव मानना इतिहास के साथ अन्याय होगा। वास्तव में यह भारत के भविष्य की दिशा को लेकर दो अलग दृष्टियों का संघर्ष था।

डॉ. आंबेडकर ने अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारंभ से ही यह अनुभव किया था कि भारतीय समाज में दलित समुदाय केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय स्तर पर भी अत्यंत अपमानजनक स्थिति में जीवन जी रहा है। उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता था, सार्वजनिक कुओं से पानी लेने की अनुमति नहीं थी, शिक्षा और प्रशासन में अवसर लगभग नगण्य थे तथा सामाजिक व्यवहार में उन्हें मनुष्य तक नहीं माना जाता था। आंबेडकर का मानना था कि ऐसी स्थिति में केवल अंग्रेजों को हटाकर स्वराज प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। यदि समाज की संरचना नहीं बदलेगी, तो सत्ता केवल उच्च जातीय वर्गों के हाथों में चली जाएगी और दलितों की स्थिति में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं आएगा।

यही कारण था कि आंबेडकर कांग्रेस की राजनीति को लेकर प्रारंभ से ही संशय में रहे। कांग्रेस स्वयं को पूरे देश का प्रतिनिधि संगठन बताती थी, लेकिन आंबेडकर का आरोप था कि उसमें वास्तविक शक्ति मुख्यतः उच्च जातीय और संपन्न वर्गों के हाथों में केंद्रित है। उनके अनुसार कांग्रेस दलितों की समस्याओं को उतनी गंभीरता से नहीं देखती थी, जितनी आवश्यकता थी। आंबेडकर कई बार सार्वजनिक रूप से यह कहते थे कि कांग्रेस दलितों के प्रश्न को नैतिक सहानुभूति तक सीमित रखती है, जबकि आवश्यकता सामाजिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन की है।

महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर के बीच मतभेद इसी संदर्भ में सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं। गांधी अस्पृश्यता को पाप मानते थे और उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए अनेक अभियान चलाए। उन्होंने उन्हें “हरिजन” नाम दिया और समाज से उनके प्रति भेदभाव समाप्त करने की अपील की। लेकिन आंबेडकर इस दृष्टिकोण से संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि दलितों को दया या करुणा नहीं, बल्कि अधिकार चाहिए। वे सामाजिक परिवर्तन को नैतिक सुधार के बजाय राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों के माध्यम से स्थापित करना चाहते थे।

आंबेडकर को लगता था कि गांधी और कांग्रेस जाति व्यवस्था की जड़ों पर उतना कठोर प्रहार नहीं कर रहे, जितना आवश्यक है। गांधी वर्ण व्यवस्था को आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से पूरी तरह अस्वीकार नहीं करते थे, जबकि आंबेडकर जाति व्यवस्था को भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराई मानते थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति “जाति का विनाश” में स्पष्ट लिखा कि जब तक जाति व्यवस्था समाप्त नहीं होगी, तब तक सामाजिक लोकतंत्र संभव नहीं है। यही वह बिंदु था जहाँ गांधीवादी सुधारवाद और आंबेडकर की क्रांतिकारी सामाजिक दृष्टि के बीच गहरी दूरी दिखाई देती है।

कांग्रेस के भीतर जवाहरलाल नेहरू आधुनिकता, वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक संस्थाओं के सबसे प्रमुख समर्थकों में थे। नेहरू सामाजिक समानता के विरोधी नहीं थे। वे भी सामाजिक सुधार और आधुनिक भारत के निर्माण की बात करते थे। लेकिन उनकी प्राथमिकता राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना और आर्थिक विकास पर अधिक केंद्रित थी। नेहरू को लगता था कि औद्योगिकीकरण, शिक्षा और लोकतंत्र के विस्तार के साथ सामाजिक असमानताएँ धीरे-धीरे कम हो जाएँगी। दूसरी ओर आंबेडकर मानते थे कि जाति जैसी गहरी सामाजिक संरचना केवल आर्थिक विकास से समाप्त नहीं होगी। इसके लिए विशेष संवैधानिक संरक्षण, आरक्षण और कठोर सामाजिक सुधार आवश्यक हैं।

यहीं से नेहरू और आंबेडकर के बीच अप्रत्यक्ष वैचारिक दूरी भी उभरती है। नेहरू कांग्रेस की मुख्यधारा के नेता थे और कांग्रेस की राजनीति राष्ट्रीय आंदोलन की केंद्रीय शक्ति थी। आंबेडकर स्वयं को उस मुख्यधारा से अलग रखते हुए दलित समुदाय की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ बनाना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि दलित नेतृत्व कांग्रेस के भीतर विलीन होकर अपनी स्वतंत्रता खो दे। यही कारण था कि उन्होंने स्वतंत्र राजनीतिक संगठन बनाए और दलितों के लिए पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की।

पृथक निर्वाचक मंडल का प्रश्न भारतीय राजनीति के सबसे विवादास्पद विषयों में से एक बन गया। आंबेडकर का तर्क था कि यदि दलित समुदाय को अपनी पसंद के प्रतिनिधि चुनने का अधिकार नहीं मिलेगा, तो उच्च जातीय बहुमत उनके वास्तविक नेताओं को कभी आगे नहीं आने देगा। गांधी ने इसका विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि इससे हिंदू समाज स्थायी रूप से विभाजित हो जाएगा। अंततः पूना समझौते के बाद पृथक निर्वाचक मंडल का विचार समाप्त हुआ, लेकिन इस संघर्ष ने आंबेडकर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया।

आंबेडकर का एक बड़ा आरोप यह भी था कि कांग्रेस दलितों के प्रश्न को चुनावी और प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। उनके अनुसार कांग्रेस के कई नेता सार्वजनिक मंचों पर दलितों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते थे, लेकिन सामाजिक व्यवहार और संगठनात्मक संरचना में वास्तविक परिवर्तन दिखाई नहीं देता था। आंबेडकर बार-बार यह कहते थे कि यदि समाज की मानसिकता नहीं बदली और दलितों को शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक शक्ति में वास्तविक भागीदारी नहीं मिली, तो स्वतंत्र भारत में भी समानता केवल एक आदर्श बनकर रह जाएगी।

नेहरू और आंबेडकर के बीच मतभेदों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि दोनों लोकतंत्र को अलग दृष्टि से देखते थे। नेहरू संसदीय लोकतंत्र और संस्थागत स्थिरता को अत्यधिक महत्व देते थे। वे भारत को एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक राष्ट्र के रूप में विकसित करना चाहते थे। आंबेडकर भी लोकतंत्र के समर्थक थे, लेकिन उनके लिए लोकतंत्र केवल चुनाव और संसद तक सीमित नहीं था। वे सामाजिक लोकतंत्र की बात करते थे। उनका प्रसिद्ध कथन था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थिर नहीं रह सकता, जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो जाए।

आंबेडकर को भय था कि यदि जातिगत असमानता बनी रही, तो लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बन जाएगा और सामाजिक रूप से शक्तिशाली वर्ग ही सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखेंगे। इसलिए उन्होंने संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण तथा विशेष संरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नेहरू इन प्रावधानों के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे लंबे समय तक जाति आधारित राजनीति को लेकर सावधान भी रहे। उन्हें चिंता थी कि अत्यधिक जातीय पहचान राजनीति राष्ट्रीय एकता को प्रभावित कर सकती है।

स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक वर्षों में यह वैचारिक अंतर और स्पष्ट दिखाई देता है। नेहरू की सरकार राष्ट्र निर्माण, पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक उपक्रमों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास पर केंद्रित थी। दूसरी ओर आंबेडकर बार-बार सामाजिक सुधारों की धीमी गति पर चिंता व्यक्त कर रहे थे। हिंदू कोड विधेयक को लेकर उत्पन्न विवाद ने इस तनाव को और बढ़ा दिया। आंबेडकर महिलाओं को संपत्ति और विवाह संबंधी अधिकार देने वाले इस विधेयक को सामाजिक क्रांति का आधार मानते थे। लेकिन संसद और कांग्रेस के भीतर विरोध के कारण इसे तत्काल पारित नहीं कराया जा सका। आंबेडकर को लगा कि सरकार सामाजिक सुधारों के प्रश्न पर पर्याप्त दृढ़ता नहीं दिखा रही। अंततः उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि मतभेदों के बावजूद नेहरू और आंबेडकर दोनों एक-दूसरे की बौद्धिक क्षमता का सम्मान करते थे। नेहरू जानते थे कि संविधान निर्माण में आंबेडकर की भूमिका असाधारण है। दूसरी ओर आंबेडकर भी नेहरू की आधुनिक दृष्टि और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता से परिचित थे। लेकिन दोनों की प्राथमिकताएँ अलग थीं। नेहरू राष्ट्र निर्माण को व्यापक राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से देख रहे थे, जबकि आंबेडकर सामाजिक न्याय को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार मानते थे।

आज जब भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता पर चर्चा होती है, तब यह वैचारिक बहस और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। आंबेडकर की चेतावनी थी कि यदि समाज में समानता नहीं आई, तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा। वहीं नेहरू का विश्वास था कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ और आधुनिक विकास भारत को आगे ले जाएंगे। भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक यात्रा इन दोनों दृष्टियों के बीच संतुलन खोजने की यात्रा रही है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि आंबेडकर का कांग्रेस और गांधीवादी राजनीति से संघर्ष किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। वह भारतीय समाज की उस पीड़ा से उत्पन्न हुआ था जिसे उन्होंने स्वयं भोगा था। वे जानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता का उत्सव उन लोगों के लिए अधूरा रहेगा जिन्हें समाज अब भी बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं है। इसी कारण उन्होंने सामाजिक क्रांति को राष्ट्रीय स्वतंत्रता जितना ही महत्वपूर्ण माना।

आज स्वतंत्र भारत में संविधान, आरक्षण, मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय की जो व्यवस्था दिखाई देती है, उसमें आंबेडकर की चेतना और संघर्ष की गहरी छाप है। वहीं लोकतांत्रिक संस्थाओं, संसदीय व्यवस्था और आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा में नेहरू की दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। भारतीय लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि उसने इन दोनों धाराओं को अपने भीतर समाहित किया। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि आंबेडकर और कांग्रेस के बीच जो वैचारिक संघर्ष था, उसने भारत को अपने समाज के सबसे कठिन प्रश्नों से सामना करने के लिए विवश किया। यही उस बहस का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563