कविता

मधुगीति

कितने प्रसंग कितने संग,
कितने ठिकाने;
इस विश्व रंग मंच आए गए,
सबक सिखाने!

हर ही स्वरूप वे ही रहे,
पात्र आत्म बिच;
किरदार अपना हर निभाया,
उनके निदेशन!

भूमिका उनकी भूमि उनकी,
उनकी कहानी;
प्रस्तुति दिया था जगत जीव,
उनकी रूहानी!

जो जितना अहं छोड़,
भाव उनके बह गया;
उतना ही चोखा अभिनय,
वो भव में कर गया!

दृष्टा थे उनके दृश्य उनके,
उनके इशारे;
‘मधु’ सबके अंग उनको लखे,
स्मित नयने!

— डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’